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उत्तराखण्ड का पाँचवाँ धाम : सेम-मुखेम

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उत्तराखण्ड का पाँचवाँ धाम : सेम-मुखेम
―पंकज चमोली

कालिया नागम् कपिलम् अनन्तम्
श्रीवासुकेशव सुत नागराजा ,
ध्यायेत नित्यम् विघ्नम् हरेतम्
वन्दे मुरारी श्रीसेममध्ये।।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उत्तराखण्ड में एक गाँव ऐसा है, जहाँ प्रत्येक परिवार के मुखिया या किसी सदस्य को जीवन में एक बार भिक्षा मांगने जाना अनिवार्य है। चाहे वो कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो। आज भी उस गांव के लोग अपनी सैकड़ों साल पुरानी इस परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। इस गाँव का नाम है सेम-मुखेम।

अपने अंदर बहुत से रहस्य और रोमांच समेटे देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा पर, समय-समय पर कई देवी-देवताओं ने अवतार लिए हैं। इसी कड़ी में एक कथा प्रचलित है जो कि भगवान श्रीकृष्ण से जुडी हुई है। श्रीकृष्ण को हम कई रूपों में पूजते हैं उन्ही रूपों में से एक है भगवान नागराजा का रूप। वैसे तो सेम नागराजा से कई कहानियां जुडी हुई हैं किन्तु सबसे ज्यादा प्रचलित और प्रमाणिक जिस लोककथा को माना जाता है वो कुछ इस तरह है।

कालिया नाग का मर्दन करने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने उसे यमुना छोड़कर केदारखण्ड (वर्तमान उत्तराखण्ड) जाकर तपस्या करने का आदेश दिया, साथ ही वचन दिया कि एक दिन तेरी तपस्या पूर्ण होगी और मैं तुझे दर्शन दूंगा। कालांतर में द्वारिका के जलमग्न होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण केदारखण्ड आये, यहाँ रमोलीहाट नामक स्थान पर घूमते घूमते प्रभु का मन रम गया और उन्होंने यहीं रहने का निश्चय कर लिया। वहाँ का सामन्त गंगू रमोला एक वीर और साहसी, किन्तु घोर नास्तिक था, लेकिन उसकी पत्नी मैनावती भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थी, वो कृष्ण को अपना धर्म भाई मानती थीं। गंगू एक सम्पन्न जागीरदार था, उसके पास अकूत धन संपत्ति और सैकड़ों दुधारू पशु थे। किन्तु उसका एकमात्र दुःख ये था कि उसकी कोई संतान नहीं थी।

भगवान कृष्ण ब्राह्मण का वेश धर के गंगू के यहाँ गए और उससे अपने रहने हेतु ढाई हाथ भूमि मांगी, लेकिन दान पुण्य से दूर, परम् नास्तिक गंगू ने उन्हें द्वार से भगा दिया। भगवान तो यहीं रहने का निश्चय कर चुके थे। काफी मनाने के बाद गंगू ने अनचाहे मन से ब्राह्मण वेषधारी कृष्ण को एक ऐसी भूमि दी, जहाँ वो अपनी गाय और भैंसों को बांधता था। भगवान ने वहां एक मंदिर की स्थापना की, जिसे वर्तमान में सेम नागराजा के रूप में जानते है। उधर नागवंशियों के राजा कालिया नाग के स्वप्न में भगवान ने उसे अपने स्थान के बारे में बताया तो नागवंशी राजा अपनी सेना के साथ प्रभु के दर्शन करने निकल पड़े, लेकिन गंगू रमोला ने उन्हें अपनी भूमि पर आने से मना कर दिया। जिससे नागवंशी राजा क्रोधित हो गए और उन्होंने गंगू पर आक्रमण करना चाहा लेकिन भगवान के समझाने के बाद उसने आक्रमण का विचार त्याग दिया। उसके बाद से प्रभु वहाँ पर नागवंशियों के इष्ट देव नागराजा के रूप में पूजे जाने लगे।

भगवान के प्रकोप से गंगू को कुष्ठ रोग हो गया, उसकी सारी संपत्ति धूल हो गयी, सभी दुधारू पशु बीमार हो गए और सम्पूर्ण रमोलीहाट में अकाल पड़ गया। मैनावती ने गंगू को समझाया कि ये सब भगवान कृष्ण के क्रोध के कारण हुआ है, इसलिए उनसे क्षमा याचना कीजिये तभी आपका उद्धार होगा। गंगू ने विधिविधान से पूजा अर्चना करके भगवान से क्षमायाचना की। उसी रात्रि उसके सपने में भगवान ने आकर गंगू को सेम में अपने मन्दिर निर्माण का आदेश दिया। भगवान के आदेशानुसार गंगू ने सेम-मुखेम में नागराजा का मंदिर बनवाया, और इसके साथ ही असीन सेम, बरसीन सेम, गुप्त सेम, लूका सेम, भूका सेम, मुखेम और प्रकट सेम में सप्तनागों के मंदिर भी बनवाये। इन मदिरों के निर्माण के बाद रमोलीहाट में सम्पन्नता वापस लौट आयी और गंगू को भी उसकी खोई हुई संपत्ति वापस मिल गयी। प्रभु की कृपा से ही गंगू के दो बेटे हुए जिनके नाम सिदुवा और बिदुवा रखे गए, जो कि आगे जाकर महान नायक बने। ततपश्चात प्रभु ने उसी मंदिर में सदैव के लिए एक बड़ी सी स्वयंभू शिला के रूप में विराजमान होना स्वीकार किया और परमधाम के लिए चले गये।

क्योंकि भगवान ने यहां सर्वप्रथम भिक्षुक ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए थे, इसलिए इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी सेम मुखेम के प्रत्येक परिवार से कोई न कोई सदस्य अपने जीवनकाल में एक बार भिक्षाटन हेतु अवश्य निकलता है। भिक्षा में प्राप्त भेंट नागराजा के मंदिर में अर्पित की जाती है।

जनपद टिहरी गढ़वाल की प्रताप नगर तहसील में समुद्र तल से तकरीबन 7000 हजार फीट की ऊंचाई पर ये मंदिर स्थित है | मन्दिर का सुन्दर द्वार 14 फुट चौड़ा तथा 27 फुट ऊँचा है। इसमें नागराज फन फैलाये हैं और भगवान कृष्ण नागराज के फन के ऊपर वंशी की धुन में लीन हैं। मन्दिर के गर्भगृह में नागराजा की स्वयंभू-शिला है। मन्दिर के दाँयी तरफ गंगू रमोला के परिवार की मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं। सेम नागराजा की पूजा करने से पहले गंगू रमोला की पूजा की जाती है। हर 3 साल में एक बार सेम मुखेम में मार्गशीर्ष माह की 11 गते (26 नवम्बर) को एक भव्य मेले का आयोजन होता है | इस मेले का बहुत धार्मिक महत्व है इसलिए हजारों की संख्या में इस दिन लोग यहाँ पर भगवान नागराजा के दर्शन करने आते हैं | मनोकामना पूर्ति और कुंडली मे कालसर्प दोष के निदान हेतु मंदिर में नाग-नागिन का जोड़ा चढाने की भी परम्परा है।

―पंकज चमोली

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