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संस्कृत का शास्त्र-निरपेक्ष शुद्ध साहित्य; नाटक : भवभूति और उनका उत्तररामचरितम्‌

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संस्कृत का शास्त्र-निरपेक्ष शुद्ध साहित्य; नाटक :
भवभूति और उनका उत्तररामचरितम्‌

कमलाकांत त्रिपाठी 

भवभूति और उनका उत्तररामचरितम्‌ (क) भवभूति और एको रस: करुणमेव का संदर्भ

कालिदास प्रकृति और मानव सौंदर्य—सूक्ष्म और स्थूल दोनों–के अप्रतिम कवि ( संस्कृत में नाटककार भी कवि है) के रूप में विश्व-प्रसिद्ध हैं, जब कि भवभूति (आठवीं शताब्दी) को संस्कृत के बाहर लोग कम ही जानते हैं। जब देश के बौद्धिक जगत में संस्कृत मात्र को बेदख़ल करने की जद्दोजहद चल रही हो, संस्कृत साहित्य की नाट्य विधा को भवभूति के विशिष्ट योगदान को सँजोना बहुत ज़रूरी है।

कालिदास ने तीन नाटकों के अतिरिक्त दो-दो प्रसिद्ध महाकाव्य और लघु काव्य भी लिखे, जिनसे उनकी काव्य-प्रतिभा को प्रस्फुटित होने का पूरा अवसर मिला ; भवभूति ने केवल तीन नाटक लिखे, लेकिन उनमें से उत्तररामचरितम्‌ के बारे में कहा गया—उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते (उत्तररामचरित में भवभूति कालिदास से विशिष्ट हो गए हैं)।

साहित्य-शास्त्र के नौ रसों में करुण रस एक है। भवभूति ने उत्तररामचरितम्‌ में करण रस को अपूर्व प्रतिष्ठा दिलाकर उसे सभी रसों का मूल स्रोत बना दिया : “एको रस: करुण एव निमित्तभेदाद्‌ भिन्न: पृथक पृथगिव श्रयते विवर्तान्‌। आवर्तबुद्‌बुद्तरङ्गमयान्वि कारान्‌ अम्भो यथा सलिलमेव तु तत्समस्तम्‌॥“ (उत्तररामचरितम्, 3:47) [ रस तो एक ही है—करुण, जो भिन्न-भिन्न प्रयोजनों से पृथक्‌-पृथक्‌ परिणामों (रसों) का आश्रय लेता है. जैसे वही जल भँवर, बुलबुला और लहर जैसे अनेक रूपों को प्राप्त होकर भी रहता जल ही है.] और जो उन्होंने कहा अपनी कृति में उसे कर दिखाया। सीता-निर्वासन की पीड़ा को राम के आत्म-निर्वासन की गहनतर पीड़ा में अंतरित कर उनके राजधर्म और मनुष्य-धर्म के बीच के तीक्ष्ण अंतर्द्वंद्व को जिस सूक्ष्मता और सहृदयता से उन्होंने रूपायित किया है, वह आदि कवि वाल्मीकि द्वारा लगाए गए कलंक को काफ़ी हद तक धो देता है।

इस प्रक्रिया में विष्णु / ब्रह्म के अवतार मिथकीय राम को भवभूति ने साधारण मनुष्य के धरातल पर लाकर उन्हें ऋजु, सुलभ और आत्मीय ही नहीं बनाया, जीवन की शास्वत विडंबना और अस्तित्व की गुत्थी से अंत तक लड़नेवाला एक ऐसा जुझारु व्यक्तित्व भी दिया, जिससे दर्शक / पाठक किसी अवतार की अपेक्षा अधिक तादात्म्य स्थापित कर सकता है। बीच में कालिदास (रघुवंश) और भवभूति की कड़ियाँ न होतीं तो शायद तुलसी का राम को सीताराम बना देना अत्युक्ति लगता।

भवभूति एक ही जगह चूके हैं, अपने सहज मार्ग से हटते हुए, शम्बूक को लोकोत्तर गरिमा प्रदान कर इस प्रसंग को अनपेक्षित चमत्कार का पुट देने के बावजूद, वाल्मीकीय रामायण के इस कीचड़ से अपने को निकाल नहीं पाये और यह काम तुलसी के लिए छोड़ गए।

उत्तरामचरितम्‌ का कथ्य लिया तो गया है वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड से—राम द्वारा जनापवाद की सूचना के कारण सीता के निर्वासन से लेकर पुनर्मिलन तक (वाल्मीकि के विपरीत भवभूति की सीता अपनी जन्मदात्री पृथ्वी में नहीं समातीं, ‘जनमत-संग्रह’ के बाद लव-कुश सहित राम द्वारा अपना ली जाती हैं–मनुष्य राम की उत्कट अभिलाषा के बावजूद राजा राम की शर्त पूरी करने के बाद ही). पर इस मूल कथा-सूत्र के अलावा सारे प्रसंग भवभूति की अपनी उद्भावना हैं, जो नाट्य तत्व को सघन करने के साथ-साथ रचना को विशुद्ध मानवीय धरातल पर अधिष्ठित करने में सहायक होते हैं।

मानवीय धरातल से एक और अर्थ निकलता है—यथार्थवादी दृष्टि। कुछ नाटकीय प्रसंगों को छोड़ दिया जाए तो यह दृष्टि भवभूति में आद्यंत अनुस्यूत है। मानव-व्यापार के यथार्थपरक कथा-सूत्र के अलावा एक-एक दृश्य के संयोजन में भी इस दृष्टि की झलक मिल जाएगी, तो यथार्थवादी दृष्टि कोई इतनी आधुनिक या नई नहीं है—लेकिन आज कौन ‘यथार्थवादी’ समीक्षक भवभूति को पढ़ने की जहमत उठाएगा ? और हम नहीं पढ़ेंगे तो कोई इंग्लैंड-अमेरिका से तो पढ़ने आएगा नहीं।

करुण रस की प्रतिष्ठा :―

भवभूति में राजा राम के निर्णय से मनुष्य राम पर थोपी गई सीता-निर्वासन की वियोग-वेदना भीतर ही भीतर घनीभूत होकर भले ही मर्म को भेद दे, बाहर आकर व्यक्त नहीं हो सकती, क्योंकि तब वह राजा राम को स्खलित कर देगी और उसी वेदना को भवभूति ने नाम दिया है साक्षात्‌ “करुण रस’’—

अनिर्भिन्नो गभीरत्वादन्तर्गूढघनव्यथ:।
पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रस:॥3:1॥

[(गोदावरी की सहायक मुरला नदी का दूसरी सहायक तमसा से –)राम का करुण रस पुटपाक (औषधि को गड्ढे की आग में रखकर पकाने के लिए ऊपर-नीचे से बंद और मज़बूत धातु का पात्र) की औषधि की तरह है, जहां सुदृढ़ता के कारण पुटपाक टूटता तो नहीं लेकिन भीतर के ताप से औषधि को पिघलाकर द्रवीभूत कर देता है, वैसे ही जैसे राम की व्यथा आवेग के ताप से मर्म को पिघलाती भीतर ही भीतर उबलती-फैलती है, लेकिन बाहर नहीं आ सकती.]

यह वेदना का वह द्रवीभूत प्रवाह है जो पहाड़ी सोते की तरह पत्थर तक को काट देता है पर बहता है अंतर्भूत और अदृश्य होकर ही–

करकमलवितीर्णैरम्बुनीवारशष्पै
स्तरुशकुनिकुरङ्गान्मैथिली यानपुष्यन्‌।
भवति मम विकारस्तेषु दृष्टेषु कोsपि
द्रव इव हृदयस्य प्रस्तरोद्भेद्योग्य:॥3:25॥

[ (बारह साल के अंतराल के बाद एक अन्य निमित्त से दोबारा पंचवटी आए राम–) सीता ने अपने कमल के फूल-जैसे सुकुमार हाथों से यहाँ के जिन पेड़ों को पानी, चिड़ियों को तिन्नी का दाना और हिरणों को मुलायम घास देकर पाला था, आज उन्हें पुन: देखकर मेरा हृदय पत्थर को तोड़नेवाले द्रवीभूत प्रवाह-जैसे किसी अनिर्वचनीय विकार (वेदना) से आप्यायित हो रहा है.]

पंचवटी की पुनर्यात्रा में राम बारंबार उस वेदना के उत्कट रूप से टकराते हैं–

त्वया सह निवत्स्यामि वनेषु मधुगंधिषु।
इतीवारमतेहासौ स्नेहस्तस्या: स तादृश:॥ 2:18॥
न किञ्चिदपि कुर्वाण: सौखैर्दु:खान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जन:॥ 2:19

[(राम–) ‘आपके साथ पुष्प-पराग की गंध से भरे इन (विंध्य) वनों में रहूँगी (आपके बिना अयोध्या में नहीं)’, ऐसा कहती हुई सीता इस महारण्य में रमण करती थी. जो जिसका प्रिय है , वह उसके लिए कुछ न करे तब भी , महज़ प्रेमभाव के (अव्यक्त) वजूद से उसके सारे दु:खों को दूर कर देता है (एक साधारण अनुभूति जो सीता-वियोग की स्थिति में सीता के कथन के साथ राम के अपने तादात्म्य को अतिशय कारुणिक बना देती है).]

पुन: —

चिरोद्वेगारंभी प्रसृत इव तीव्रो विषरस:
कुतश्चित्संवेगान्निहित इव शल्यस्य शकल:।
व्रणो रूढग्रंन्थि: स्फुटित इव हृन्मर्मणि पुन:
पुराभूत: शोको विकलयति मां नूतन इव॥ 2:26॥

[(राम‌–) चिरकाल तक निरंतर उद्विग्न रखनेवाले और पूरी तरह फैल गए तेज़ विषैले द्रव की तरह ; कहीं से बहुत तेज़ी से आकर हृदय में घुस गए वाणाग्र के टुकड़े की तरह, और हृदय के मर्म-स्थल में हुए संधिवाले फोड़े के फूटने की तरह आज वह (सीता-वियोग का) पुराना शोक मुझे फिर से बेधकर व्याकुल कर रहा है]

पंचवटी की इस दूसरी यात्रा में सीता के साथ बिताये वनवास के पुराने दिनों की याद, सीता-निर्वासन के वर्तमान वियोग का शोक, पश्चात्ताप और आत्मग्लानि बनकर राम को इस क़दर घेर लेती है कि वे मूर्छित हो जाते हैं. मूर्छा के ठीक पहले का उनका संवाद है–

यस्यां ते दिवसास्तया सह मया नीता यथा स्वे गृहे, यत्सम्बंधिकथाभिरेव सततं दीर्घाभिरास्थीयत ।
एक: सम्प्रति नाशितप्रियतमस्तामेव राम: कथं,
पाप: पंचवटी विलोकयतु वा गच्छत्वसम्भाव्य वा॥“ (2:28)

[जिस पंचवटी को घर-जैसा बनाकर मैंने सीता के साथ वे (वनवास के) दिन बिताए और फिर जिसकी याद में परस्पर लम्बे-लम्बे वार्तालाप करते हुए (अयोध्या में) बाद के दिन बिताए, उसे अब प्रियतमा का नाश करनेवाला पापी मैं अकेला कैसे देखूं ? और (न देखूं तो) उसका अनादर करके चला भी कैसे जाऊँ ? ( भवभूति ने यहां राम के मुख से अपने लिए पापी नहीं ‘पाप’ शब्द का प्रयोग कराया है, जिसके सीधे-सीधे हिंदी अनुवाद से वाक्य अटपटा हो जाता है–साक्षात्‌ पाप होना पापी से बहुत बढ़कर है).]

और अंत में दण्डकवन की नीरवता में राजा राम के कठोर न्याय के विरुद्ध मनुष्य राम की वह आर्त पुकार—

हे भगवंत: पौरजनपदा: !
न किल भवतां देव्या: स्थानं गृहेsभिमतं तत-
स्तृणमिव वने शून्ये त्यक्त्वा न चाप्यनिशोचिता।
चिरपरिचितास्ते ते भावास्तथा द्रवयन्ति मा-
मिदशरणैरद्यास्माभि: प्रसीदत रुद्यते॥3:32॥

[हे महानुभाव नागरिको एवं देशवासियो !
घर में सीता देवी का रहना आप लोगों को नहीं भाया. इसलिए मैंने उसे निर्जन वन में तृण की तरह निराश्रय छोड़ दिया और इसके लिए पश्चात्ताप भी नहीं कर पाया ( राजा का ऐसा आचरण निंदित सीता के जन-भावना के प्रतिकूल होता). पर इस समय ( दीर्घ वनवास के कारण) चिरपरिचित ये (वृक्ष, पक्षी , मृग आदि) वनवासी मुझे ऐसा व्याकुल कर रहे हैं कि मैं अशरण होकर कलप रहा हूँ. अब आप लोग प्रसन्न हों.]

उत्तररामचरितम्‌ करुण रस की अपूर्व निष्पत्ति के अतिरिक्त दो और अर्थों में विशिष्ट, बल्कि अद्वितीय है. एक– गृहस्थ जीवन की ऊष्मा और विश्वास से दीप्त दाम्पत्य या स्वकीया प्रेम का पूर्ण परिपाक; और दो– बीहड़, विकराल और बीच-बीच में अति मनोरम विंध्य-स्थली (दण्डकारण्य) में प्रकृति के नाना रूपों का सूक्ष्मतम चित्र, जिसकी तुलनाके लिए विश्व-साहित्य में शायद ही कोई अन्य कृति मिले।
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भवभूति का उत्तररामचरितम्– (ख) स्वकीया (दाम्पत्य) प्रेम का निकष :―

प्रगाढ़ स्वकीया प्रेम की प्रस्तुति के लिए नाटक के शुरू में ही बहुत उपयुक्त अवसर का सृजन किया गया है। माताएँ गुरु वशिष्ठ और गुरु-पत्नी अरुंधती के साथ जामाता ऋष्यशृंग के यज्ञ में गई हुई हैं। सीता के गर्भवती होने के कारण ऋष्यशृंग ने उन्हें नहीं बुलाया था और उनकी देख-भाल के लिए राम की आवश्यकता के चलते उनके लिए भी आग्रह नहीं किया था। और जब राम और सीता नहीं गए तो लक्ष्मण को भी रुकना ही था ऐसे में सीता की इच्छाएँ पूरी करने और उनके साथ रहने में राम अधिक समय देते हैं। लक्ष्मण ने सीता के मनोविनोद के लिए राम के पूर्व-जीवन पर एक चित्रकार से चित्रपट तैयार करवाया है जिसे वे दिखाने आते हैं। राम और सीता एक-एककर चित्र देखते जा रहे हैं और कुछ-न-कुछ टिप्पणी करते जा रहे हैं। विश्वामित्र से जृम्भक अस्त्र प्राप्त करने के दृश्य से शुरू होकर विवाह के अवसर पर मिथिला के चित्रों को देखते हुए वे अयोध्या के प्रसंगों पर पहुँचते हैं. और तब:

राम : (सास्रम्‌) स्मरामि हंत ! स्मरामि.
जीवत्सु तातपादेषु नूतने दारसंग्रहे।
मातृभिश्चिंत्यमानानां ते हि नो दिवसा गता:॥1:19॥
इयमपि तदा जानकी—
प्रतनुविरलै: प्रांतोन्मीलनमनोहरकुंतलै-
र्दशनकुसुमैर्मुग्धालोक शिशुर्दधती मुखम्‌।
ललितललितैर्ज्योत्सनाप्रायैर्रकृत्रिमविभ्रमै-
रकृत मधुरैरम्बानां मे कुतूहलमङ्गकै:॥1:20॥“

[राम : (आँसूभरी आँखों से) याद करता हूँ, ओह ! याद करता हूँ.
तब पिताजी जीवित थे. नया-नया विवाह हुआ था. और माताएँ हमारी सुख-सुविधा के लिए चिंतित रहती थीं. कैसे तो बीत गए वे दिन !
उस समय यह जानकी भी नवयौवना थी। दुबले गालोंवाला चेहरा, उस पर उसके सुंदर बिखरे हुए बाल। इससे और फूलों के समान दाँतो से वह चेहरा कितना मोहक लगता था ! अपने सुकुमार, मनोरम और चाँदनी-सदृश शुभ्र अंगों तथा उनके सहज-स्वाभाविक विलास से यह माताओं में कुतूहल उत्पन्न किया करती थी.]

चित्रपट आगे बढ़ता है. वनवास ! चित्रकूट. गोदावरी-तट. पंचवटी. सर्वथा अलग तरह का दाम्पत्य. लेकिन और भी प्रगाढ़:

किमपिकिमपिमन्दं मंदमासक्तियोगा-
दविरलितकपोल जल्पतोरक्रमेण।
अशिथिलपरिरम्भव्यापृतैकैकदोष्णो-
रविदितगतयामा रात्रिरेव व्यरंसीत्‌ ॥1:27॥

[तीव्र प्रेमासक्ति के चलते परस्पर गालों को सटाये, आहिस्ता–आहिस्ता, बिना सिर-पैर की बातें करते, एक-एक बाँह को प्रगाढ़ आलिंगन में लपेटे, दोनों की रात ऐसे बीत जाती थी कि उसके प्रहरों का पता ही नहीं चलता था.]
चित्रदर्शन की थकान से सीता राम के वक्षस्थल पर ही सिर रखकर सो जाती हैं. उन्हें प्रेम से निहारते हुए राम—

इयं गेहे लक्ष्मीरियममृतवर्तिर्नयनो-
रसावस्या: स्पर्शो वपुषि बहुलश्चंदनरस:।
अयं बाहु: कण्ठे शिशिरमसृणो मौक्तिकसर:
किमस्या न प्रेयो यदि परमसह्यस्तु विरह:॥1:38॥

[यह घर की लक्ष्मी है, आँखों के लिए अमृत-शलाका है ( इसे देखना जीवनदायी है), इसका स्पर्श शरीर पर चंदन का लेप है (उद्विग्नता का शमन करता है), गले में पड़ी हुई इसकी भुजा शीतल, मृदुल मुक्ताहार है (अंतस्थल को शीतलता और स्निग्धता देती है). इसकी कौन सी वस्तु है जो मुझे परम प्रिय नहीं ! बस इसका वियोग असह्य है. (वियोग, जिसके सीता-हरण के समय के अनुभव से यह बात निकली है, और जो एक क्रूर विडंबना बनकर कुछ ही क्षणों में पुन: उपस्थित होनेवाला है)]

जब सीता स्वप्न में ‘हे आर्यपुत्र ! आप कहाँ हैं’ ऐसा कुछ बुदबुदाती हैं तो राम महसूस करते हैं कि शूर्पणखा आदि का भयानक चित्र देखकर डरी सीता को स्वप्न में वियोग की चिंता सता रही होगी. इस भय से मुक्त करने के लिए उन्हें छूते हुए उन्हें संतुलित दाम्पत्य जीवन के परिपक्व स्वरूप का एहसास होता है—

अद्वैतं सुखदु:खयोरनुगतं सर्वास्वस्थासु यत्‌
विश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा यस्मिन्नहार्यो रस:।
कालेनावरणात्ययात्परिणते यत्प्रेमसारेस्थितं
भद्रं तस्य सुमानुषस्य कथमप्येकं हि तत्प्रार्थ्यते॥1:39॥

[जो दाम्पत्य सुख और दु:ख में समान रहता है, सभी स्थितियों में साथ देता है, जिसमें मन को विश्राम मिलता है, जिसमें निहित अनुराग वृद्धावस्था द्वारा भगाया नहीं जाता, जो समय बीतने के साथ लज्जा-संकोच आदि आवरण के हटने से परिपक्व होकर अपने प्रेमोत्कर्ष में स्थित होता है, उसका यह कल्याणकारी सारतत्व सर्वथा वरेण्य है.]

लेकिन विधि का विधान ! सीता की स्वप्नावस्था का भय अकारण नहीं है. पहले से भी भयंकर वियोग बस उपस्थित ही होनेवाला है ! और भूमिका बन चुकी है।
चित्र-दर्शन से ठीक पहले ऋष्यशृंग के यहां से उनका और गुरु वशिष्ठ का राम और सीता के लिए संदेश लेकर अष्टावक्र आए थे। उन्होंने राम को सीता का समुचित ध्यान रखने और उनका हर दोहद (गर्भ-जन्य इच्छा) पूरी करने की हिदायत दी थी। वशिष्ठ ने राम को यह भी कहलवाया था कि हम लोग वहाँ नहीं हैं, आप राज्य के लिए अभी नये हैं, इसलिए प्रजा का अनुरंजन करने में लगातार तत्पर रहें, जो रघुवंशियों की बहुमूल्य सम्पत्ति है. राम ने अष्टावक्र के माध्यम से उन्हें आश्वस्त करनेवाला संदेश भी भेजा था:

स्नेहं, दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा॥1:12॥

[प्रजा के अनुरंजन के लिए कोई भी प्रेम, कोई भी मैत्री, यहाँ तक कि जानकी तक को छोड़ने में मुझे कष्ट नहीं होगा.]

और राम के इस वाक्य का समर्थन करते हुए सीता ने कहा था—
अदो जेव्व राहवकुलधुरंधरो अज्जउत्तो [ (प्राकृत) इसी विशेषता के कारण तो आर्यपुत्र (पति के लिए प्रयुक्त होनेवाली संज्ञा) रघुकुल के धुरंधर हैं.]

और दोनों के वचन की परीक्षा बस कुछ घड़ियाँ दूर थी। राजा राम और मनुष्य राम, राजधर्म और मनुष्य-धर्म के बीच का वह शास्वत द्वंद्व, जो भारतीय राजनीतिक चिंतन और सामूहिक जीवन के आदर्श की विशिष्ट देन है, जिसमें राजतंत्र निरंकुश एकतंत्र नहीं है बल्कि जनोन्मुखता एवं कुछ स्थापित मूल्यों से सीमित है—कम से कम सिद्धांत और पैमाने में. यह द्वंद्व ऐसी विडंबनाओं को बार-बार जन्म देता रहा है। ऐतिहासिक चरित्र जुलियस सीजर के जीवन में भी ऐसी ही एक विडम्बना खड़ी हुई जब उसे यह कह कर अपनी पत्नी को तलाक़ देना पड़ा था कि सीजर की पत्नी को संदेह से परे होना चाहए, जो एक कहावत बन गई।

अस्तु, विडंबना, जो जीवन-यथार्थ का अविच्छेद्य अंग है, के कुशल, स्वाभाविक सन्निवेश के बिना कोई भी कृति उत्कृष्ट साहित्यिक कृति नहीं बन पाती. उत्तररामचरितम्‌ की कथा-योजना का केंद्रीय तत्व यही विडंबना है, जिसका कुशल निर्वाह भवभूति की एक बड़ी उपलब्धि लगती है।

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भवभूति के उत्तररामचरितम्‌ में विशिष्ट कोटि का प्रकृति-वर्णन :―

कालिदास में भी बहुत उत्कृष्ट प्रकृति-वर्णन है और प्रभूत मात्रा में है, लेकिन इस मामले में भवभूति का पटल अधिक विस्तृत और संश्लिष्ट लगता है. भवभूति की दृष्टि प्रकृति के कठोर और व्यापक यथार्थ पर गई है, जब कि कालिदास ने शृंगार रस के अनुरूप प्रकृति के कोमल-कांत स्वरूप को चुना है, जो मूलत: रागात्मक है और जिसका सौंदर्य अनुभव-जन्य से अधिक कल्पना-प्रसूत है। भवभूति का जन्म विंध्य क्षेत्र के विदर्भ प्रांत के पद्मपुर नामक नगर में हुआ था और अधिकांश कवि-जीवन कन्नौज-नरेश यशोवर्मा(शा.का. 725-752) के दरबार में बीता था।

यशोवर्मा का राज्य विंन्ध्य-क्षेत्र तक फैला हुआ था. विंध्य की वनस्थली में स्थित दण्डकारण्य के वर्णन में उन्होंने अपूर्व ऊँचाई प्राप्त की है, जो इतनी प्रामाणिक है कि यथार्थ अनुभव के बिना संभव नहीं लगती. उसके दोनों तरह के भूभाग—घोर जंगल और जनस्थान जहाँ वनवासी या तपस्वी रहते थे— पूरी विविधता और सूक्ष्मता में मूर्तिमान हुए हैं। अनुवाद-सहित कुछ छंदों के उद्धरण से ही इसका आस्वाद लिया जा सकता है:

कण्डूलद्विपगंण्डपिण्डकषणोत्कम्पेन सम्पातिभि-
र्घर्मस्रंसितबंधनैश्च कुसुमैरर्चन्ति गोदावरीम्‌।
छायापस्किरमाणविष्किर मुखव्याकृष्टकीटत्वच:
कूजत्क्लांतकपोतकुक्कुटकुला: कूले कुलायद्रुमा:॥2:9॥

[गोदावरी-तट. वृक्षों का झुरमुट. उनकी शाखाओं से लटकते पक्षियों के घोंसले। तनों की छाल में भक्ष्य पदार्थ ढूँढ़ते, उनपर चोंच चलाते पक्षियों द्वारा कीड़े निकाले जा रहे हैं. वृक्षों पर तेज़ धूप से त्रस्त कबूतरों और बनमुर्गों का झुंड कलरव कर रहा है। हाथियों के खुजलाते कपोलभाग को पेड़ों से रगड़ने के कारण, धूप से शिथिल पड़े डंठलोंवाले उनके गिरते हुए फूल मानों गोदावरी की पूजा कर रहे हैं (भावानुवाद, क्योंकि एक ही विशेष्य और बाक़ी पद विशेषण या विशेषण के विशेषण होने, और उनसे बना एक ही वाक्य होने से हिंदी-अनुवाद दुरूह हो जाता है).]

स्निग्धश्यामा: क्वचिदपरतो भीषणाभोगरूक्षा:
स्थाने स्थाने मुखरककुभो झाङ्कृतै निर्झराणाम्‌।
एते तीर्थाश्रमगिरिसरिद्गर्त कांतारमिश्रा:।
संदृश्यन्ते परिचितभुवो दण्डकारण्यभागा:॥2:14

[दण्डकारण्य के ये प्रदेश कहीं स्निग्ध और श्यामल (सघन हरीतिमा का प्रकृत रंग), कहीं भीषण विस्तार के साथ रूखे, कहीं झरनों के झंकार की झाम्‌-झाम्‌ से मुखरित दिशाओं वाले, तो कहीं तीर्थ, आश्रम, पहाड़, नदी, गड्ढे और उनके बीच से जाते दुर्गम मार्गवाले हैं, लेकिन सब ( पूर्व निवास के कारण राम को) परिचित भूमिवाले दिख रहे हैं (बारह साल में वनस्पतियों का रूप-परिवर्तन हुआ है, किंतु ज़मीन तो वही है).]

निष्कूजस्तिमिता: क्वचित्क्वचिदपि प्रोच्चण्डसत्वस्वना:
स्वेच्छासुप्तगभीरभोगभुजगश्वासप्रदीप्ताग्नय:।
सीमान: प्रदरोदरेषु विरलस्वल्पाम्भसो यास्वयं
तृष्यद्भि: प्रतिसूर्यकैरजगरस्वेदद्रव: पीयते॥2:16॥

[वन के सीमान्त क्षेत्रों में कहीं तो नि:शब्द निस्तब्धता छाई हुई है, कहीं जानवरों के भयंकर शब्द हो रहे हैं, कहीं मनमर्ज़ी सोए पड़े विशालकाय साँपों की सांस से आग-सी जल रही है, तो कहीं गिरगिट गड्ढों में पानी की अतिशय न्यूनता से अजगरों के पसीने का पानी चाट रहे हैं.]

इह समदशकुन्ताक्रांतवानीरवीरुत्‌-
प्रसवसुरभिशीतस्वच्छतोया वहन्ति।
फलभरपरिणामश्यामजम्बूनिकुञ्ज-
स्खलनमुखरभूरिस्रोतसो निर्झरिण्य:॥2:20।।

[यहाँ जंगल के बीच से बहनेवाली नदियों का पानी शीतल और साफ़, और बेत की लताओं पर फूलनेवाले फूलों से सुगंधित है, जिसमें फलों के एक साथ पक जाने से काले-काले दिखते जामुन-वृक्षों के झुरमुट से टकराकर आवाज़ करनेवाले सोते आकर मिलते हैं.]

दधति कहरभाजामत्र भल्लूकयूना-
मनुरसितगुरूणि स्त्यानमम्बूकृतानि।
शिशिरकटुकषाय: स्त्यायते शल्ल्कीना‌-
मिभलितविकीर्णग्रन्थिनिष्यन्दगंध:॥2:21॥

[यहाँ गुफाओं में रहनेवाले युवा रीछों के थूकने के शब्द प्रतिध्वनित होकर चारों ओर फैलकर बढ़ रहे हैं. (हाथी के लिए खाद्य) शल्लकी लताओं के हाथियों द्वारा कुचले और इधर-उधर फेंके जाने से उनके शीतल, तीखे और कसैले रस की गंध फैल रही है.]

गुञ्जत्कुञ्जकुटीरकौशिकघटाघुत्कारवत्कीचक-
स्तम्बाडम्बरमूकमौकुलिकुल: क्रौञ्चाभिधोsयं गिरि:।
एतस्मिन्प्रचलाकिनां प्रचलतामुद्वेजिता: कूजितै-
रुद्वेल्लन्ति पुराणरोहिणतरु स्कन्धेषु कुम्भीनसा:॥2:29॥

[क्रौंच नामका पर्वत. उस पर लता आदि से घिरे कुटीर. उनमें रहनेवाले उल्लुओं की घू-घू की आवाज़. वह आवाज़ कीचक बाँस (बाँस की वह जाति जो हवा के सम्पर्क में आने से कर्र-कर्र की ध्वनि करता है) की ऊँची आवाज से मिल गई है. उस मिली-जुली आवाज़ से डरकर कौवे चुपचाप बैठे हैं. एक और आवाज़– इधर-उधर घूमते मोरों की केका, जिससे घबड़ाकर पुराने चंदनवृक्षों के तनों पर लिपटे साँप इधर-उधर रेंगने लगे हैं (भावानुवाद).]

एते ते कुहरेषु गद्‌गदनदद्गोदावरीवारयो
मेघालम्बितमौलिनीलशिखरा: क्षोणीभृतो दाक्षिणा:।
अन्योन्यप्रतिघातसंङ्कुलचलत्कल्लोलकोलाहलै-
रुत्तालास्त इमे गभीरपयस: पुण्या: सरित्सङ्गमा:॥2:30

[ये दक्षिण दिशा के वे पर्वत हैं जिनकी गुफाओं में गोदावरी का जल (ऊपर से नीचे के पत्थरों पर) गद्गद (कल-कल नहीं) की ध्वनि करता हुआ गिर रहा है. जिनकी चोटियों के शिखर पर ठहरे बादलों से वे श्याम रंग की दिख रही हैं. और ये अगाध जल-वाली नदियों के संगम हैं, जो परस्पर टकराकर अत्यंत चंचलता से उठती बड़ी-बड़ी लहरों के शोर से डरावने लगते हैं.]

पर्यावरणविद्‌ मानते हैं कि प्रकृति का सान्निध्य मनुष्य को सुकून देता है और उसे अमूमन सरल, शांतिप्रिय, सहनशील और उदारचेता बनाता है. ऐसे चित्रोपम और ध्वन्यात्मक प्रकृति-वर्णन को पढ़ना-गुनना भी तो कुछ वैसा ही असर देता होगा (लेकिन फ़ुरसत किसे है !).

यह भवभूति के उत्तररामचरितम्‌ की कुछ बानगी है जो उपरोक्त कथन— ‘उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते’– में कितना सच है, यह निश्चय करने में सहायक हो सकती है. कालिदास और भवभूति एक ही भाषा और एक ही परंपरा के कवि हैं, लेकिन कथ्य, शिल्प और मिज़ाज में कितना फ़र्क ! यह वही भवभूति हैं जिन्होंने अखंड आत्मविश्वास से कहा था—‘उपत्स्यते हि मम कोsपि समनधर्मा कालोsह्यंनिरवधि विपुला च पृथ्वी’ (मेरे किए को समझनेवाला कोई तो समानधर्मा पैदा होगा, क्योंकि काल निस्सीम है और पृथ्वी भी बहुत बड़ी है). तो जब कालिदास का प्रसंग आए तो भवभूति को याद करना न भूलें; हो सकता है आप भी उनके समानधर्मा निकलें।
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कमलाकांत त्रिपाठी
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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