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सतना में दुर्गा पूजन ; कल, आज और कल ―निरंजन शर्मा

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सतना में दुर्गा पूजन ; कल, आज और कल

श्री निरंजन शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

―निरंजन शर्मा(वरिष्ठ पत्रकार)

बंगाल में शताब्दियों से चल रही दुर्गा पूजा का चलन अब पूरे देश और विदेशों तक में फैल गया है ! विंध्यप्रदेश के लगभग सभी इलाकों में नवरात्रि खप्पर के साथ नाचती हुई काली, कुछ लोगों के मुंह और जीभ में छिदे हुए बानों और जवारे बोने व नौवें दिन किसी जलाशय में विसर्जित कर आने के पर्व के रूप में सदियों से मनाई जाती रही है ! मैहर में शारदा माता का मंदिर तो पूरे देश में प्रसिद्ध है ! शहडोल में कंकाली, सिंगरौली में ज्वालामुखी, घोघरा सीधी में चंडिका, रीवा में काली और फूलमाता देवी, पन्ना में बड़ी देवी, पवई में कलेहिन देवी सहित अन्य लगभग सभी स्थानों और गाँवों में कालका और बड़ी देवी के प्रसिद्ध मंदिर हैं ! किसी गाँव में मंदिर नहीं है तो देवी की मढुलिया तो है ही और मढुलिया भी नहीं तो चबूतरों में भी वे विराजमान हैं !

तमाम गाँवों में स्थापित ग्राम्य-देवियों के प्राचीन मंदिर धीरे-धीरे काली के मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गए हैं ! भटनवारा की देवी भरहुत स्तूप से ला कर वहां स्थापित एक यक्षिणी की प्रतिमा है ! अब जो नए मंदिर बन रहे हैं वह गौरांग देवियों के मंदिर हैं ! दुर्गा जी के नाम से बन रहे मंदिरों में अब सवर्ण भी काफी मात्रा में जाने लगे हैं ! वैष्णव-मान्यता में काली एक तामसी देवी है चूंकि इसके प्राचीन मंदिरों में जीव-बलि दी जाती थी ! पहले इनकी मूर्तियों या तस्वीर को पूजा-गृह में भी नहीं रखा जाता था लेकिन फिर धीरे-धीरे शैवों से मिश्रण के बाद वैष्णव-वृत्ति में परिवर्तन हुआ और वे भी इनकी पूजा में चमत्कार देखने लगे ! पहले अधिकांशतः माली और कहीं-कहीं ढीमर इनके पंडे होते थे और मूलतः चर्मकार इनकी भगतें गाते थे और उनमें से कुछ अपनी जीभ व गालों में नुकीले बाने छेद कर देवी का प्रताप और भक्ति प्रदर्शित करते थे ! ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और आदिवासी जन देवी-पूजा में कौतूहलवश शामिल तो होते थे मगर दूर से ही देखते थे ! आदिवासी केवल बड़ा देव को मानते हैं ! पुराने जमाने में चैत मास की नवरात्रि का ज्यादा महत्व था ! बाद में शारदेय नवरात्रि का भी बढ़ गया !

समाज में धीरे-धीरे नौ देवियों के सिद्धांत का प्रचार हुआ ! भगवती पुराण और देवी पुराण की कहानियां चल पड़ीं ! जहां तक सतना में देवी पूजा का सवाल है यहां जिला अस्पताल के पूर्वी छोर में पुराने नगरपालिका कार्यालय के सामने देवी के दो अति प्राचीन मंदिर हैं ! खेरमाई मंदिर भी 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शहर की बसाहट के पूर्व का है ! खेरमाई क्षेत्र विशेष की ग्राम्य देवी का एक स्वरूप है जो अब नवरात्रि में अन्य देवियों के साथ पूजा जाता है ! इन मंदिरों में वैसे साल भर पूजन, भजन-कीर्तन होते रहते हैं ! धीरे-धीरे इन मंदिरों में रौनक बढ़ी है ! जबारों के साथ साथ नवरात्रि में दुर्गा-पूजा, उनकी प्रतिमाओं की स्थापना व विसर्जन का चलन सतना में सन 1955 से शुरू हुआ ! सर्वप्रथम संडरसन चूना कंपनियों के बंगाली कर्मचारियों ने दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना की ! एक अरसे बाद बजरहा टोला में नवरात्रि के दौरान दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की जाने लगी ! फिर जैसे “खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है” वह कहावत अख्तियार हुई और दुर्गा प्रतिमाओं का चलन तेजी से बढ़ा !

नवरात्रि में मूर्ति पूजा की स्थापना और दशहरे के दिन इनकी झांकियों का चल समारोह सतना में पिछले 50 साल में खूब फला-फूला ! सतना का सन 1982 से लेकर सन 90-95 तक का समय दुर्गा पूजा पंडाल स्थापना के लिए स्वर्णकाल कहा जाएगा ! दुर्गा पंडाल हालाँकि आज भी सजते हैं मगर सजावट का वह दौर कहीं नहीं दिखता जब लगभग पूरा बाजार दुल्हन की तरह सज जाता था ! 40-40 फुट के सजावटी गेट बनने लगे थे ! आसपास के गांव के ग्रामीण शहर का दशहरा देखने के लिए उमड़ पड़ते थे ! दशहरा चल समारोह के पूरे पथ पर दोनों और फुटपाथों में, छतों में हजारों की भीड़ इकट्ठी होती थी ! इन को संभालने के लिए जवाहर नगर में रावण वध की रामलीला के समय से लेकर दूसरे दिन तक पुलिस-प्रशासन भीड़ प्रबंधन के लिए सतर्क हो जाता था ! ऐसा समय भी आया जब चल समारोह के बाद रात 12 बजे से शहर के तत्कालीन तीनों सिनेमा हालों में सुबह तक के लिए फिल्मों के शो आयोजित होने लगे, जिनमें ग्रामीण लोग सुबह तक का समय काटते थे ! पंडालों में कई चमत्कार और तमाशे वाले लोग बाहर से आने लगे ! सन 89 में टिकुरिया टोला में बाहर से आया एक बाबा हंथेली में दीपक जला कर नौ दिन बैठा आकर्षण का केन्द्र बना रहा !

दशहरे की रात भगवान श्री राम के रथ के पीछे सैकड़ों दुर्गा झांकियां प्रशासन की ओर से दिए गए नंबरों की क्रमबद्धता के अनुरूप चलतीं थीं ! पूरे शहर में जुलूस निकलता था ! दशहरा शारदेय नवरात्रि के 10वें दिन होता है लिहाजा लंका विजय कर लौटे श्री राम की झांकी के साथ महिषासुर का वध कर लौटीं दुर्गा की झांकी भी निकलने लगीं ! इसे विजय जुलूस कहा जाने लगा ! जवाहरनगर मैदान से निकलने वाला दशहरे का जुलूस पहले रामणा टोला से निकलता था ! यहाँ रावण की बड़ी प्रतिमा कुछ साल पहले तक मौजूद थी !

दुर्गा-पूजा की स्थापना का चलन इस क्षेत्र में तेजी से फैला ! समारोह-जगराता मोहल्ले-मोहल्ले सार्वजनिक तौर पर होते थे फिर इस पर्व में गुजराती समाज ने गरबा का तड़का लगा दिया ! अब तो जगह-जगह गरबे होने लगे हैं ! वास्तव में इस सबके पीछे व्यापारियों से मिले चंदे का प्रभाव था ! व्यापारी की मंशा थी कि नौ दिन की सजावट एवं झांकी के लिए चंदा देकर हम 10-15 दिन आगे-पीछे तक के लिए बाजार में रौनक ला दें और लोगों खासतौर से युवकों की मंशा होती थी कि लोगों के चंदे से उनका महिना-पंद्रह दिन का खर्चा चले एवं मनोरंजन हो ! मोहल्ले के पुराने और भावी नेताओं को भी इनमें चेहरा चमकाने का अवसर मिलने लगा ! पूजन-अर्चन तो बोनस के तौर पर था ही !

दुर्गा-पूजा की स्थापना से लेकर इनके विसर्जन तक इनमें शराबी युवकों का बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना और डीजे में भड़कीले और अश्लील गानों के साथ लहालोट नाच करने में भक्ति के भाव तो नहीं दिखते हैं पर पंडाल में रखी प्रतिमा के दर्शन व पूजन तो साधारणजन भक्ति-भाव से ही करते दिखते हैं ! लोग पैदल घूम-घूम कर पूजन पंडालों में सजी दुर्गा जी की झांकियां देखते हैं ! जगह-जगह भंडारे होते हैं ! सतना की देखा-देखी आसपास के कस्बों तहसील मुख्यालयों और ग्रामों तक दुर्गा पंडालों में प्रतिमाओं की स्थापना होने लगीं ! पहले सतना में जबलपुर एवं इलाहाबाद से दुर्गा प्रतिमाएं खरीद कर ट्रेन से लाई जातीं थीं ! फिर कारीगर यहीं स्थाई डेरा डालकर रहने लगे ! यह कारीगर सैकड़ों मूर्तियां बना-बना कर बेचने लगे ! बड़ा बाजार विकसित हो गया मगर यह साल कोरोना का काल है और सब कुछ उसके गाल में समा गया है लिहाजा दुर्गा पूजा के माहौल में हर बार की तरह इस बार उत्साह का आलम नहीं उदासीनता की भावना व्याप्त हो गई है ! दुर्गा पूजा तो फिर भी होगी पर इस साल जुलूस-चल समारोह आदि तो होना नहीं हैं !

सतना में दुर्गा झाँकियों और दशहरे का जुलूस:―

सतना में दशहरे का चल जुलूस निकालने और उन्हें देवी प्रतिमा की झांकियों को शामिल करने का चलन सन 67-68 के आसपास शुरू हुआ ! पहले बिहारी रामलीला समाज के रामरथ के साथ एक-दो झांकियां छोटे हाँथ ठेलों में चलतीं थीं ! फिर उनकी संख्या बढ़ने लगी ! सन 82-84 में जिला कलेक्टर आर.परशुराम और पुलिस अधीक्षक श्री आशा गोपालन के प्रशासनकाल में झांकियों की संख्या 100 से अधिक पार हो गई और सन 90-92 में जिला कलेक्टर सुधिरंजन मोहंती व पुलिस अधीक्षक नंदन तिवारी के प्रशासनकाल में झांकियों की संख्या 200 के आसपास तक पहुंच गईं ! मगर समय बदलता रहता है पिछले वर्ष बिहारी रामलीला समाज वालों के रामरथ के पीछे एक भी झांकी नहीं थी ! कोई अपने पंडाल की झांकी सतना नदी ले जाता है तो कोई टमस में विसर्जन करने जाता है और कोई-कोई दुर्गा पूजा समिति अपनी दुर्गा जी को नवरात्रि के दो दिन बाद तक बैठाए रहते हैं ! बाद में विसर्जन करते हैं ! देर रात तक और तड़के से इनके लाउडस्पीकरों से कभी फ़िल्मी गीतों की तर्जों वाले भजन तो कभी निचाट फिल्मी गीत प्रवाहित होते रहते हैं ! चल समारोह के आगे चलने वाले श्रीराम के रथ भी अब दो हो गए हैं- एक बिहारी रामलीला समाज का तो दूसरा डालीबाबा रामलीला समाज का ! चार साल पहले इन दोनों में आगे चलने को लेकर झगड़ा हो गया था और मामला पुलिस तक पहुंच गया था !

पंडाल की भव्यता और सजावट में पुरस्कारों ने पैदा किया प्रतिस्पर्धा का दौर:―

सतना के नवरात्रि व दशहरा समारोह में प्रतिस्पर्धा का भाव जब पैदा हुआ जब प्रशासन के संरक्षण में बिहारी रामलीला समाज ने प्रतिमा, झांकी एवं सजावट के कई पुरस्कार सतना शहर की विभिन्न समितियों को देना शुरू किए ! 30-40 फुट तक के गेट बनने लगे ! बाहर से बड़े शहरों के कलाकार सतना में पंडाल-सज्जा एवं मार्ग सजावट का काम करने के लिए आने लगे फिर राज्याभिषेक की रामलीला के दिन जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति में नामों की घोषणा होती ! बाद में इन पुरस्कारों में पक्षपात के आरोप लगने लगे ! पुरस्कार वितरण के समय ही विजेता समिति जिंदाबाद के नारे लगाने लगती और हारी हुई समितियों के लोग मुर्दाबाद कहते निकल जाते ! गांधी चौक, भैंसाखाना चौक व लालता चौक आदि समितियों ने कई बार पुरस्कार जीते हैं ! एक समय सिमरिया चौक में शराब ठेकेदार राजू जायसवाल की ओर से सजाया जाने वाला दुर्गा जी का बड़ा पंडाल आकर्षण का केंद्र बना रहता था ! सतना सीमेंट एवं यूसीएल कंपनी में भी भव्य पंडाल सजते हैं ! यूसीएल में हर नवरात्रि के दौरान होने वाला कवि सम्मेलन भी सालों प्रसिद्ध रहा है ! राष्ट्रीय स्तर के कवि इसमें आते थे मगर पिछले दशक से यह कवि सम्मेलन बंद हो गया है !

सतना में कई साल चला है उचेहरा की झांकी का सिक्का:―

दशहरे के दूसरे दिन रात को सतना आने और घूमने वाली उचेहरा की झांकी का एक समय जल्बा रहता था ! उचेहरा की इस झांकी में सजावट का विशेष ध्यान रखा जाता था और नित-नए साल में झांकी की थीम बदलती रहती थी ! यह दशहरे के दूसरे दिन सतना में अकेले विचरण करती थी और पुजापा व चढ़ोत्री प्राप्त करती थी ! लोगों में इसके प्रति आकर्षण था ! सन 1975 से लेकर 2008 तक इसका सतना आना जारी रहा मगर अब इसका आना बंद हो गया है ! उचेहरा की इस झांकी की भी एक कहानी है ! सन 67 से सन 77 तक सतना की विधायक रहीं श्रीमती कांताबेन पारेख का मायका उचेहरा था तो उनके भाई-बंधुओं की अध्यक्षता व प्रभाव वाली उचेहरा की कमेटी ने सतना भ्रमण की अनुमति प्रशासन से प्राप्त कर ली ! उचेहरा क्योंकि धनाढ्य व्यापारियों का पुराने जमाने का शहर था तो वहां की समिति अच्छी झांकी भी बनाती थी मगर सतना में इसका भ्रमण श्रीमती कांताबेन की पहल से हुआ और फिर कई साल तक चला !

जब देवी के त्रिशूल से बाल-बाल बची राक्षस की जान:―

सतना में जुलूस-भ्रमण में घूमने वाली कई झांकियां जीवंत बनाई जाती थीं ; जीवंत ऐसी कि इसमें दुर्गा और राक्षस के रूप में सजीव पात्र बैठते थे जैसे श्रीराम के रथ में रामलीला वाले बैठते हैं ! लंबे समय तक बिहारी रामलीला समाज के कर्ता-धर्ता रहे हरिप्रकाश गोस्वामी सन 1969 के चल जुलूस का विशेष जिक्र करते हैं ! उस झांकी में वे राम बने थे ! उस समय तक इक्का-दुक्का झांकी राम रथ के पीछे चलतीं थीं ! तब बिहारी रामलीला समाज ने श्री राम रथ के पीछे अपनी बनाई दुर्गा जी की जीवंत झांकी चलाई ! इसमें राक्षस के रूप में देवी के नीचे अधलिटाये गए श्री लक्ष्मी सोनी उर्फ बुल्लू अभी जीवित हैं ! उन्होंने बताया कि 51 साल पहले जब वे 30 साल के थे रामलीला कमेटी ने झांकी में राक्षस बनने को कहा ! रामलीला का डांसर गंगा प्रसाद दुर्गा बना और उसके सीने में त्रिशूल अड़ा कर खड़ा हो गया ! लोग चकित भाव से इस झांकी को देख रहे थे ! झांकी रामना टोला से चली मगर जब हनुमान चौक के पास पहुंची तो अचानक राक्षस बने पड़े बल्लू को लगा कि रामलीला में शंकर जी के हाथ रहने वाला त्रिशूल जो आज “दुर्गा जी” लिए खड़ी हैं उसके सीने में चुभ रहा है और चुभन बढ़ती जा रही है ! बुल्लू ने इशारे से आयोजकों को बुलाया और देवी बने गंगा से त्रिशूल में जरा जोर कम कराने को कहा मगर दुर्गा बने गंगा के स्वरूप ने अनसुना कर दिया ! लोगों ने देखा कि उसकी लाल-लाल आंखें और फैलती जा रही हैं और दुर्गा जी का शरीर थर्रा रहा है जैसे तेज बुखार चढ़ गया हो ! देवी शायद भाव में आ गईं थी !

अब क्या हो ! दो-तीन लोग त्रिशूल को राक्षस की छाती से ऊपर उठाने में लग गए मगर त्रिशूल की चुभन बढ़ती गई ! जुलूस रुक गया ! भक्तों की नगड़िया और जोर से बजने लगी उधर चिंतित आयोजक “राक्षस” को बचाने के हर संभव उपाय करने लगे ! बुल्लू बताने लगे- वह तो ईश्वर की कृपा थी कि त्रिशूल का बड़ा और मुख्य सिरा उन की सोने की चैन के ऊपर टिक गया और वह किसी तरह बचे ! तीन चार लोगों ने ताकत लगाकर त्रिशूल के नीचे मोटा कपड़ा रखने के लिए जोर लगाया ! तभी देवी का मंत्र जानने वाले रामेश्वर कहार ने मंत्र पढ़कर पानी के छींटे थरथरा रहीं दुर्गा जी के मुख पर बार-बार मारे तब कहीं जाकर देवी शांत हुई और राक्षस असली में मरते-मरते बचा !

―निरंजन शर्मा(वरिष्ठ पत्रकार)

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