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आन्दोलन से मुक्ति की दरकार:किसान नेता अपनी सनक कब छोड़ेंगे?

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आन्दोलन से मुक्ति की दरकार:किसान नेता अपनी सनक कब छोड़ेंगे?
कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
―कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कृषि कानूनों के लागू होने पर मान. सुप्रीम कोर्ट की अस्थायी रोक एवं समिति गठित के आदेश आने के पश्चात भी हाय-तौबा मचा हुआ है। विपक्षी दलों एवं आन्दोलन की बागडोर थामने वाले किसान नेताओं ने अब माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित समिति के सदस्यों के ऊपर ही प्रश्नचिन्ह लगाना शुरु कर दिया है। वे बतला रहे हैं कि सलाह के बाद ही समिति के समक्ष वे अपनी बातें रखेंगे या न रखेंगे इस पर निर्णय लिया जाएगा। अब सवाल यही है कि आन्दोलन किसलिए होते हैं? तो जवाब यही होगा कि अपनी माँग मनवाने एवं उन बिन्दुओं का हल निकालने के लिए जिनके विपरीत प्रभाव की आशंका है। किन्तु यहां स्थिति उलटी दिखलाई देती है। केन्द्र सरकार द्वारा आयोजित आठ से नौ दौर की वार्ता बैठकों के उपरांत भी कोई कारगर उपाय नहीं निकल पाया।

सरकार संशोधन के लिए किसान नेताओं के प्रस्तावों पर चर्चा करने एवं उन बिन्दुओं का सार्थक हल निकालने की दिशा में कदम बढ़ाती नजर आई। किन्तु किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसान नेता कृषि कानूनों पर संशोधन के लिए अपना स्पष्ट पक्ष नहीं रख पाए।

वे कृषि कानूनों की वापसी पर अड़े हुए दिखे तो सरकार कृषकों के हितार्थ प्रतिबध्दता प्रकट करती हुई संशोधनों के लिए वार्ता करती नजर आई। लेकिन अब जबकि आन्दोलनों में विभिन्न कारणों से कृषकों की मृत्यु एवं सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त होने से बचाने व राष्ट्र में वैधानिक स्थिति बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने समाधान का रास्ता निकालने के लिए कानूनों को स्थगित करते हुए इन कानूनों की कमियों को दूर करने के लिए समिति गठित की है । तब भी यदि किसान नेता सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से सहमति दर्ज नहीं करवा रहे तो उनकी मंशा पर प्रश्नचिन्ह उठना लाजिमी है।

यह बात तो ठीक है कि असहमति के लिए लोकतांत्रिक तरीकों से असहमति,धरना प्रदर्शन,आन्दोलनों के नाते अपना विरोध दर्ज करवाया जाना चाहिए।माना कि सरकार नहीं सुन रही है व सरकार अपनी नीतियों के प्रति प्रतिबद्ध है। लेकिन जब कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर हल निकालने की कवायद की है तब भी तथाकथित किसान नेता आन्दोलन को समाप्त करने की बजाय राजनैतिक पाखंड का खेल खेलने की दिशा में आतुर दिख रहे हैं।

अब इसे क्या माना जाए? आप सरकार की नहीं सुनेंगे । सुप्रीम कोर्ट की नहीं सुनेंगे। तो आप किसकी बात सुनेंगे? किसी भी मुद्दे का हल तो सरकार के पास ही होता है न!? संसद द्वारा पारित कानून ही विधिमान्य होता है तथा यह सरकार के पास शक्ति होती है कि वह कानूनों को कैसे लागू करेगी।

 

हमारी न्यायपालिका केवल यह देखती है कि विधायिका द्वारा बनाए गए या संशोधित कानून के लिए विधिसम्मत तरीकों का पालन किया गया है या नहीं।न्यायपालिका इसी आधार पर कोई निर्णय सुना सकती है। यह भारतीय लोकतंत्र की खूबी है कि हमारी न्यायपालिका कृषि कानूनों पर मध्यस्थता की भूमिका का निर्वहन करते हुए सरकार व आन्दोलनरत कृषकों की सहमति के लिए चार सदस्यीय – भूपिंदर सिंह मान, अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ), अनिल घनवटे (शेतकरी संगठन) और प्रमोद जोशी (खाद्य नीति विशेषज्ञ) समिति गठित कर समाधान का प्रयास कर रही है।

मान. सुप्रीम ने कोर्ट विधिसम्मत तरीकों से इस मुद्दे का समाधान करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। लेकिन सरकार विरोध में मदान्ध ‘गैंग’ अब इस पर भी छद्म नैरेटिव की तोप चलाने की तैयारी कर ली है। ये कह रहे हैं कि हम न तो सरकार की सुनेंगे ,न सुप्रीम कोर्ट की सुनेंगे – जो हम कहेंगे वही स्वीकार किया जाए।आखिर यह सनक कैसी है? जहाँ आप केवल यह जिद कर रहे हैं कि कानूनों को सरकार वापस ले । संशोधन के लिए न तो आप सुझाव दे पा रहे व न ही समाधान के लिए तत्पर दिख रहे हैं। बल्कि कृषि कानूनों के अलावा तमाम तरह के तीर हवा में चलाए जा रहे हैं।पता नहीं यह कैसी आत्ममुग्धता है कि जहाँ सरकार,न्यायपालिका किसी की भी बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं।देश तो सरकार एवं न्यायपालिका ही चलाती है।यदि इनकी बातें नहीं सुनेंगे तो किसकी सुनेंगे?

 

सवाल तो इन तथाकथित किसान नेताओं से भी है।क्या ये सम्पूर्ण देश के किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं? आन्दोलन का इंतज़ाम बढ़िया है व सभी लोग सहमत हैं कि कृषक हितैषी हल निकलकर आए।लेकिन किसान नेताओं के राजनैतिक स्टंट देखने पर तो यही प्रतीत होता है जैसे कठपुतली को इशारों से नचाया जा रहा हो।सम्भवतः आन्दोलन में शामिल आम किसान भी खुद को ठगा महसूस कर रहा होगा।क्योंकि आन्दोलन जिस मुद्दे के लिए है ,जब उस पर सरकार व आन्दोलकारियों के बीच मध्यस्थता करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समिति गठित कर दी है।यदि उसके पश्चात किसान नेता लाईमलाईट व टी.वी.चैनलों की डिबेट व इण्टरव्यू के फैशन को न छोड़ने के चक्कर में किसानों को आन्दोलनों से मुक्त नहीं कर रहे ,तब तो यह स्थिति और घातक है। किसान नेता अपनी यह सनक कब छोड़ेंगे व आन्दोलन को समाप्त कर समाधान की ओर रुख करेंगे?

दूसरी ओर पैनी दृष्टि के साथ घटनाक्रमों एवं इन सबके पीछे के निहितार्थ को समझने का प्रयास किया जाए तो सबकुछ स्पष्ट सा दिख रहा है। किसान आन्दोलन के सहारे बौध्दिक नक्सलियों की फौज व भारतीयता के विरोधी तत्वों द्वारा उन कई सारे प्रयोगों को किया जा रहा है जिन्हें प्रत्यक्ष तरीके से कर पाना असंभव एवं दुष्कर है।

कृषकों के नाम की सहानुभूति हासिल कर उन एजेंडों को मूर्तरूप देने के प्रयास चल रहे हैं जिनके पीछे राष्ट्रघात है:―

कृषकों के नाम की सहानुभूति हासिल कर उन एजेंडों को मूर्तरूप देने के प्रयास चल रहे हैं जिनके पीछे राष्ट्रघात है। इस मुद्दे को भी ‘प्रयोग’ की तरह देखा जा रहा है,यदि इस पर सरकार झुके और कानूनों को वापस ले ले । तब इनकी गैंग कहीं भी ऐसे प्रायोजित धरना प्रदर्शन आन्दोलन कर देश की संसद के विभिन्न कानूनों को रद्द करने के लिए देश को आग में झोंकने के लिए तत्पर हो जाएँगे। इसके लिए ये ‘इको सिस्टम’ के तहत काम कर रहे हैं जिसमें प्रमुख तोपची वही हैं जो देशविरोधी,हिन्दूविरोधी ,कुकृत्यों, गतिविधियों को संचालित,प्रायोजित करने का दुस्साहस कर स्वयं को ‘विक्टिम’ की तरह पेश करते रहते हैं।

सरकार व समस्त देशवासियों की अपने कृषकों के साथ सम्वेदनाएँ, सहानुभूति हैं तथा कृषकों की खुशहाली के लिए सभी प्रतिबध्द हैं। सरकार, संशोधन करने को तत्पर है तथा मान.सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित समिति के उपरांत जो समाधान आएगा व निश्चय ही ‘नीर-क्षीर’ होगा।

लेकिन आन्दोलन की आड़ में क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थों, सरकार विरोध, खालिस्तानी मूवमेंट व हिन्दी-हिन्दू विरोध का एजेंडा चलाकर अपनी खोई हुई राजनैतिक, अकादमिक जमीन तलाशने वाले इस पर भी अपनी हताशा दिखला रहे हैं। इसी तरह वामपंथियों का रक्तिम व हत्यारा इतिहास -चरित्र किसी से छिपा नहीं है,जो किसान आन्दोलन के पिछले दरवाजे से अपनी पैठ बनाने के लिए अमादा है। क्यों ?आखिर क्यों? इसके लिए थोड़ा पीछे जाकर पिछले वर्ष के घटनाक्रम की ओर देखना होगा।

असल में किसान आन्दोलन की आड़ लेकर अपने मंसूबों को अमलीजामा पहनाने वाली गैंग यह चाहती ही नहीं कि कृषक आन्दोलन समाप्त हो व समाधान के रास्ते समन्वयपूर्ण कृषक हितैषी नीति के अन्तर्गत संशोधन के साथ कृषि कानून लागू हों।बस इसी कारण के चलते वे इस पर सरकार को घेरकर घेराबंदी करने की फिराक में हैं जिससे उन्हें राजनैतिक-अकादमिक वॉक ओवर मिले और वे प्रभुत्व स्थापित कर सकें। 26जनवरी के दिन कृषकों की परेड वाला नैरेटिव क्या है?वही न कि राजनैतिक स्टंट दिखलाकर सरकार के विरुध्द विषवमन करते हुए अप्रिय घटनाओं की स्थिति निर्मित की जाए।

कृषि कानूनों पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव की रणनीति के लिए ‘सिख’ प्रतिनिधित्व के नाम पर विदेशी दबाव के पूर्व में किए गए प्रयास क्या दर्शा रहे हैं?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पुतले जलाना,अपमानजनक अपशब्द कहना व खालिस्तान प्रेम की जुगलबंदी ,भारतमाता की जय न बोलने के अभियान, पंजाब, हरियाणा इत्यादि से सटे इलाकों में सार्वजनिक स्थान विवरण बोर्डों के ‘हिन्दी’ में लिखे नामों को मिटाया जाना,सीएए,एनारसी वापस लो के नारे व पोस्टर  क्या यह किसान आन्दोलन के मुद्दे हैं? इसी तरह विदेशों में सिख समूह के लोगों द्वारा किसान आन्दोलन के नाम पर भारत विरोध के नारे ।नरेन्द्र मोदी के मरने के लिए बद्दुआएं देती कम्युनिस्ट पार्टी की महिलाएं।क्या यह अराजकता नहीं है?ऐसा कौन सा देश है जहाँ वहां की संसद द्वारा बनाए गए कानून के विरोध में इस तरह के कृत्य किए जाते हैं और वहां की सरकार सब आसानी से बर्दाश्त कर लेती है?यह सब सिर्फ़ भारत में लोकतंत्र की दुहाई देकर किया जा सकता है।

इन सबकी पृष्ठभूमि के पीछे कई सारे शातिर महारथी लगे हुए थे जो सिर्फ़ इसकी प्रतीक्षा में थे कि कब ऐसा मुद्दा हाथ लगे और वे अपने अन्दर के विष को फैला सकें।यह सब छटपटाहट है सत्ता से वंचित होने एवं जमीन से अस्तित्व के नेस्तेनाबूद होने की।क्योंकि राष्ट्रघात व हिन्दू विरोध के इन छद्मवेशी बौध्दिक नक्सलियों, राजनैतिक लुटेरों को राष्ट्र ने लगातार पटखनी देकर उनके कुकर्मों की सजा दी है।बस इसीलिए वे सभी ‘गैंग’ बनाकर छद्मावरण में कृषक आन्दोलनों की आड़ से अपनी शातिर चाल चलने लगे।

गौर करिए राममंदिर निर्माण के फैसले, धारा-३७० की समाप्ति,तीन तलाक कानूनों से उपजी छटपटाहट के बाद सीएए ,नागरिकता कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली को दंगों की आग में झोंककर नरंसहार का षड्यंत्र रचने वाले चेहरे कौन थे? किन लोगों ने दिल्ली की सड़क को कैद करने के लिए भड़काया ? किस गैंग के लोग ‘हिन्दुत्व’ की कब्र खोदने की बात कह रहे थे?जब इन सभी प्रश्नों एवं घटनाक्रमों के उत्तर ढूँढ़ लेंगे तब सबकुछ दर्पण की तरह सुस्पष्ट हो जाएगा।

किसान नेताओं को अब यह समझना चाहिए कि कहीं वे सचमुच में तो इसी गैंग की कठपुतली बनकर किसानों के साथ धोखा तो नहीं कर रहे?इसलिए इस कुचक्र ,षड्यंत्र का पर्दाफाश कर अन्नदाता की ओट लेकर रचे जाने वाले कुत्सित मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।यह देश हमारा है किसान हमारे हैं उसकी पीड़ा एवं दुर्दशा को दूर करने का कार्य सरकार एवं विधि का शासन स्थापित करने का दायित्व न्यायपालिका तथा सत्य मार्ग पर चलते हुए राष्ट्रनिर्माण को गति देने के लिए ‘राष्ट्रघातियों’ का विनाश कर सभी को अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी।
कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कार्टून :―प्रख्यात कार्टूनिस्ट मनोज कुरील की फेसबुक वॉल से साभार

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