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अनैतिकता में से ‘अ’ हटाने की इतनी बेसब्री क्यों ?

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अनैतिकता में से ‘अ’ हटाने की इतनी बेसब्री क्यों ?
~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

आज सुबह से इस न्यूज़ को देख रहा हूं।कोई बताए इसमें गलत क्या है? माना कि चौकसे जी ने एनएसयूआई का जिलाध्यक्ष बनाने के लिए पांच से दस लाख रुपये की ही मांग की है। उन्हें तो और ज्यादा मांगना चाहिए था‌‌। जब देने वाले को दिक्कत नहीं है और न लेने वाले को दिक्कत है,तो बेवजह सबके पेट में दर्द क्यों हो रहा है?

चौकसे जी हैं अगर चौका मार के चौंकाएंगे नहीं तो खाक! कांग्रेसी कहलाएंगे ।ऊपर से तब जब छ: – आठ महीने पहले एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष बने तिरपाठी को ठिकाने लगाने में कुछ तो बड़ी क़ीमत लगी होगी। आखिर! उसकी भरपाई चौकसे जी नहीं करेंगे तो क्या हम आप करेंगे?

जब देखो तब कांग्रेस और एनएसयूआई के पीछे पड़े रहते हो। देख नहीं रहे महंगाई का जमाना है‌‌। ऊपर से चौकसे जी को महंगाई के खिलाफ बिगुल बजाना था तो उन्होंने बजा दिया। लेकिन लोग हैं तो बेवजह बवाल काट रहे‌ ।जबकि इस अन्धाधुंध महंगाई में भला पांच दस लाख रुपये से होता ही क्या है ? मगर विपक्षी हैं तो मानते ही नहीं। वे जलते और चिढ़ते हैं हमारे चौकसे जी से। उनसे चौकसे जी की उन्नति देखी नहीं जा रही है। इसलिए हमेशा सब कोई एनएसयूआई को ही नैतिकता का पाठ पढ़ाने में लगे रहते हैं। भला अनैतिकता में से ‘अ’ हटाने की इतनी बेसब्री क्यों ? अभी चौकसे जी को अध्यक्ष बने ही कितने दिन हुए हैं। उनका ढंग से स्वागत सत्कार भी नहीं हो पाया और उनकी कमाई के जरिए पर लोग चर्चा करने लग गए।

इसी विषय पर जब हमने अपने एक विधायक जी से चर्चा की तो उन्होंने कहा – यार,गज़ब करते हैं अखबार वाले भी। एक स्क्रीनशॉट को लेकर खबर छाप देते हैं‌। और पूरे विपक्षी एक अदने से एनएसयूआई अध्यक्ष की कमाई को ग़लत ठहराने पर लग जाते हैं। हमने उनसे कहा सही बात है विधायक जी। बेवजह उसको आपसे ज्यादा तवज्जो मिली रही है।

हां, सही कह गए‌।

देखो! तुम तो जानते हो इतनी कवरेज तो हमें तब भी नही मिली थी जब हमने अपना शहर के पाश इलाके का एक बड़ा सा प्लाट और चार पांच करोड़ देकर टिकट खरीदी थी‌। कसम! से अगर इतनी लाईमलाईट तब हमें मिल जाती तो हम भी आज मुख्यमंत्री की दावेदारी कर रहे होते। पर अफसोस करके रह जाते हैं।

या आज का टोरबा ,चार दिना पहिले अध्यक्ष का बना पूरी मीडिया कवरेज के अऊ सोशल मीडिया म सुर्खियां बटोरे है।

बिल्कुल विधायक जी! हमें भी इसका क्षोभ है‌ । पर करें तो करें क्या? आपने उस समय हमें बता दिया होता तो वायरल करवाकर आपकी कवरेज बढ़वा देते‌ । फिर भी विचार करेंगे।

लेकिन ये तो बताओ तुम्हें चौकसे के मामले में क्या लगता है? ये फिजूल में ही बड़का नेता तो नहीं बन जाएगा?

पहले तो हम अपने विधायक जी के प्रश्न सुनकर
गहरी चुप्पी साधे रहे‌ ‌। और जब हमारे विधायक जी हमारा जवाब सुने बिना हमें छोड़ने वाले ही नहीं थे तब हमने भी बोल दिया-

विधायक जी जो! आपको लगता है!

क्या हमको लगता है? उन्होंने कुटिल मुस्कान छेड़ते हुए कहा‌‌।

वही…….! और हम दोनों ठहाका लगाकर हंस पड़े ‌।

जाते जाते विधायक जी ने कहा –

वाह्…मान गए । खेल गए न! हमारे साथ राजनीति।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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