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हमारा अस्तित्व: आकस्मिकताओं का पुंज ―कमलाकांत त्रिपाठी

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हमारा अस्तित्व: आकस्मिकताओं का पुंज

―कमलाकांत त्रिपाठी

शुद्ध विश्वास के सहारे सत्य तक कैसे पहुँचा जा सकता है? हममें से प्रत्येक जिस पर चाहे उस पर, और जो चाहे सो विश्वास कर सकता है। विश्वास वैयक्तिक होता है। सब का भिन्न-भिन्न हो सकता है, परस्पर विरोधी भी। सत्य तो एक ही होगा। इसलिए शुद्ध विश्वास सत्य तक पहुँचने का मार्ग कैसे हो सकता है?

बुद्धि समय और स्थान के आयामों से सीमित है। समय कभी शुरू हुआ और कभी ख़त्म हो जाएगा या अनादि एवं अनंत है? यदि कभी शुरू हुआ तो उसके पहले क्या था और कभी ख़त्म होगा तो उसके बाद क्या होगा? जैसे समय का शुरू और अंत होना समय-सापेक्ष बुद्धि से परे है, वैसे ही समय का अनादि और अनंत होना भी समय-सापेक्ष बुद्धि से परे है।

ब्रह्मांड का विस्तार कहाँ तक है? उसकी सरहद के पार क्या है, क्या वह ब्रह्मांड का हिस्सा नहीं है? तो ब्रह्मांड का अर्थ क्या हुआ?

ब्रह्मांड निरंतर बढ़ रहा है—उसकी नीहारिकाएँ (galaxies) एक-दूसरे से दूर भागती जा रही हैं। इस तरह बढ़ता हुआ ब्रह्मांड जिस अतिरिक्त स्थान को अपनी ज़द में लेता जा रहा है, वहाँ इसके पहले क्या था? ब्रह्मांड के बाहर भी कुछ हो सकता है? फिर वही सवाल, तो ब्रह्मांड का अर्थ क्या हुआ ? बुद्धि समय की तरह स्थान के आयाम से भी सीमित है, तो उसे समझ में नहीं आता, ब्रह्मांड है क्या चीज़।

आजकल स्टीफ़ेन हॉकिंग के बिग बैंग सिद्धांत का बड़ा रुतबा है, देखिए कब तक रहता है! उसके अनुसार ब्रह्मांड एक सूक्ष्मतम बिंदु से शुरु हुआ जो काले छिद्र जैसा था। बिग बैंग के पहले समय नहीं था, स्थान नहीं था, इसलिए ब्रह्मांड का भी कोई अस्तित्व नहीं था। बिग बैंग जब भी घटित हुआ हो, हम उसके पूर्व नहीं जा सकते क्योंकि तब समय का वजूद ही नहीं था। बिग बैंग के कारणों में भी नहीं जा सकते क्योंकि समय और स्थान के अस्तित्व में आने के पहले किसी कारण का अस्तित्व ही नहीं हो सकता था। बिग बैंग कारणों का कारण है, आदि कारण है।

ध्यातव्य है कि हॉकिंग महोदय की यह मान्यता कि एक निश्चित बिंदु पर ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई, उसी के साथ समय और स्थान की भी उत्पत्ति हुई और तब से समय बीतने के साथ-साथ ब्रह्मांड के आयतन का लगातार विस्तार हो जा रहा है, लगभग वैसी ही है जैसी निरीश्वर सांख्य के आचार्य कपिल की थी—सृष्टि स्वयंभू है, उसका कारण सृष्टि में ही निहित है। इस तरह बिग बैग सिद्धांत कपिल के निरीश्वर सांख्य की तरह आस्थावानों की ब्रह्मांड के सर्जक, नियंता एवं पालनकर्ता ईश्वर की अवधारणा को ख़ारिज कर देता है। हॉकिंग के अनुसार बिग बैंग का घटित स्वायत था, प्रकृति के स्वायत्त नियमों के अनुरूप था, किसी के संकल्प, निर्णय या चयन पर निर्भर नहीं था।

दुनिया में बहुत से लोग आज बिग बैंग सिद्धान्त को मानते हैं। उनमें से कितने हैं जो बुद्धि से समझकर मानते हैं और कितने मात्रा आस्था से मानते हैं? मैं इस सिद्धांत को नहीं समझ पाता, इसलिए नहीं मानता। जिस दिन समझ में आएगा, मान लूँगा। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि हॉकिंग महोदय को ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य से जूझते-जूझते आप्तवाक्य जैसा कुछ आभास हो गया हो, फिर उसे ही एक वैज्ञानिक सिद्धांत का जामा पहना दिया हो। पता नहीं, अंतरिक्ष विज्ञान में भी कहीं आस्था का तत्व न घुस आया हो। ऐसा है तो विज्ञान ही उसका निराकरण भी करेगा, विज्ञान में अंतिम कुछ भी नहीं है।

बिग बैंग दुनिया के प्राचीनतम उपलब्ध काव्य ऋग्वेद में सृष्टि-विषयक “यथापूर्वमकल्पयत्‌” (10.190.2) से भी ज़्यादा दूर नहीं है। इस ऋचा के अनुसार सृष्टि एवं प्रलय का एक चक्र चलता है। जिस तरह पहले सृष्टि सम्पन्न हुई थी, उसी तरह हर प्रलय के बाद होती है।

वेदांत में, जो वेदों की व्याख्या करने का दावा करता है, कहा गया कि सृष्टि यानी माया भी ब्रह्म की तरह अनादि है, बस उसकी तरह अनंत नहीं है, “ज्ञान” से निरस्य है; ज्ञान हो जाने पर एक ही तत्व रह जाता है—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।“ इसीलिए “प्रज्ञानं ब्रह्म” भी एक महावाक्य है।

यहाँ बृहदाराण्यक उपनिषद्‌ का वह प्रसिद्ध मंत्र भी द्रष्टव्य है– “ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥“ (5.1.1) [ब्रह्म भी पूर्ण है, सृष्टि भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है और पूर्ण ही शेष रहता है।] सृष्टि तो पूर्ण और स्वतंत्र हो सकती है। किंतु यह किसी अन्य पूर्ण से नि:सृत हुई, इसे किसने देखा? इस मंत्र की रचना तो सृष्टि के बहुत बाद, मनुष्य के अस्तित्व में आने और उसके भाषा सीखने के उपरांत ही हो सकती थी।

तो बिग बैंग के बावजूद ब्रह्मांड की उत्पत्ति जितनी रहस्यमय ऋग्वेदकाल में थी, उतनी ही आज भी है। इसे यहीं छोड़ते हैं। अपेक्षाकृत सीमित दायरे में आ जाते हैं। हमारी नीहारिका (Galaxy), आकाशगंगा (Milky Way) में, हमारे सूर्य और सूर्यमंडल की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ?

माना जाता है कि हमारा सूर्य और हमारे सौरमंडल के ग्रह 460 करोड़ (4.6 बिलिअन) साल पहले बने। उसके पहले गैस और धूल का एक विशाल सौर बादल (solar nebula) था। पास में स्थित एक अन्य सौर बादल के आकस्मिक रूप से फट जाने से हुए विस्फोट की आघात-तरंगों से हमारा सौर-मंडल बन गया। उसके बीच में हाइड्रोजन और हीलियम गैसों से प्रज्वलित हमारा सूर्य और उसके चारों ओर बनी चकती में पृथ्वी-सहित सौरमंडल के नौ ग्रह बन गए। सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के चलते ये ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने लगे। इनमें से केवल हमारी पृथ्वी का परिक्रमा-पथ संयोगवश सूर्य से ठीक इतनी दूरी पर स्थिर हुआ कि इस पर जीवन की संभावना उत्पन्न हो गई। अन्यथा हमारी पृथ्वी माता इतनी गर्म या इतनी सर्द होतीं कि उन पर या उनमें जीवन संभव ही नहीं होता।

शुरू में यह सूर्य से निकली हमारी ये माता जी भी सूर्य की तरह जलते हुए आग के गोले-जैसी थीं, फिर ठंडी होकर खौलता हुआ जल बन गईं, फिर जल ठंडा हुआ, जल की सतह पर पपड़ी पड़ी, पपड़ी सख़्त हुई और पृथ्वी माता की गोद जीवन-धारण करने लायक बन गई। इस तरह कड़ी-दर-कड़ी माता जी की एक लम्बी यात्रा के बाद हमारे अस्तित्व में आने की गुंजाइश पैदा हुई।

फिर एक और संयोग घटित हुआ। एक मत के अनुसार, मंगल के आकार का एक आकाशीय पिंड (Theia) अपनी कक्षा (सूर्य की परिक्रमा का अपना पथ) छोड़कर पृथ्वी से आ टकराया। टकराने से उस ग्रह का और पृथ्वी का भी एक हिस्सा टूट कर चूर-चूर हो गया। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ये चूर-चूर हुए टुकड़े उसके चारों ओर तेज़ रफ़्तार से घूमने लगे। इसी तेज़ रफ्तार के चलते वे एकजुट होकर चंद्रमा बन गए। उसके पहले पृथ्वी 6 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर लगा लेती थी। चंन्द्रमा बनने के बाद दो बातें हुईं। चक्कर की गति धीमी पड़कर षष्ठांश रह गई और उसमें 24 घंटे लगने लगा। साथ ही गुरुत्वाकर्षाण के तीन केंद्र (सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा) बन जाने से आए संतुलन के कारण पृथ्वी अपनी कक्षा में स्थिर हो गई। इन दो बातों में से एक के भी न होने पर पृथ्वी पर जीवन नहीं हो सकता था।

यह मान्यता तो निर्विवाद है कि अपना सूरज 5 बिलियन सालों में अपनी सारी हाइड्रोजन और हीलियम गैसें जलाकर बुझ जाएगा और पृथ्वी-सहित हमारे सौर मंडल के सारे ग्रह शून्य में गुम हो जायेंगे।

5 बिलियन सालों बाद सृष्टि का विलुप्त होना तो तय है। किंतु उसके पहले भी किसी आकस्मिक खगोलीय घटना से हमारा अस्तित्व ख़त्म हो सकता है। सात ग्रहों के अतिरिक्त सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती ऐसटॅराइड बेल्ट का कोई बड़ा ऐस्टॅराइड ठीक पृथ्वी के ऊपर गिर गया (छोटे-बड़े ऐस्टॅराइड आकस्मिक रूप से गिरते ही रहते हैं) तो जीवन नष्ट हो जाएगा। ऐसी अन्य कई खगोलीय घटनाएँ आकस्मिकता से जीवन नष्ट कर सकती हैं। पृथ्वी आकस्मिकता से बनी है, आकस्मिकता से इसमें जीवन आया है और वह आकस्मिकता से ख़त्म भी हो सकता है, पृथ्वी भी ख़त्म हो सकती है–किसी भी समय। ब्रह्मांड में ऐसी घटनाएँ घटती ही रहती हैं। आये दिन तारे (सूरज) तक अपने ग्रहों के साथ ख़त्म होते रहते हैं, नए पैदा भी होते रहते हैं।

जीवन (सचेतन प्राणी) का अस्तित्व तो छुरी की धार पर टिका हुआ है:–

पृथ्वी का वातावरण बहुत गर्म हो जाने पर कोई विशालकाय ग्लेशियर पिघलकर ‘प्रलय’ ला सकता है। ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी के अतिशय गर्म होने पर, या वातावरण के अत्यधिक प्रदूषण से सूर्य की किरणों के मार्ग में बाधा उत्पन्न होने से अतिशय ठंडी होने पर, पृथ्वी के ऊपर जीवन, कम से कम मानव-जीवन, नष्ट ही हो सकता है। ब्रह्मांड की यात्रा, उसमें पृथ्वी की यात्रा, उसमें जीवन की यात्रा, उसमें भी मनुष्य की यात्रा तो एक लघु क्षण-जैसी है। इसके पहले कोई मानव-चेतना नहीं थी जिसे स्वयं के और शेष विश्व के अस्तित्व का बोध होता। आगे भी ज़रूरी नहीं कि मानव-चेतना या मात्र चेतना भी क़ायम रहे। लेकिन जड़, अचेतन, अदृश्य, अननुभूत, स्वायत्त और स्वच्छ्वसित ब्रह्मांड ठाठें मारता चेतना के पहले भी वजूद में था और चेतना के बाद भी वजूद में रहेगा.

प्रागैतिहासिक काल का तो पता नहीं, ऐतिहासिक काल में, औद्योगिक युग प्रारम्भ होने के पहले भी अनेक भयंकर महामारियाँ, आई हैं, दुर्भिक्ष पड़े हैं, जिनसे जनसंख्या का एक बड़ा अंश नष्ट हो गया। इन महामारियों और दुर्भिक्षों की उत्पत्ति का कारण ज्ञात नहीं, न ज्ञात हो सकता है। इतना तो तय है कि कारण प्रकृति का निरंकुश दोहन नहीं था, तब हो ही नहीं सकता था। बस अकस्मात्‌ ये महामारियाँ और दुर्भिक्ष आ उपस्थित हुए थे।

कुछ प्रकृति-प्रेमी और कार्य-कारण शृंखला में विश्वास करनेवाले (कर्म-फल का सिद्धांत भी उसी का एक प्रोटोटाइप है) मानते हैं कि कोरोना की उत्पत्ति प्रकृति के साथ निरंकुश छेड़छाड़ से हुई है। इसकी कोई युक्तिसंगत या वैज्ञानिक व्याख्या नहीं देते। प्रकृति के साथ निरंकुश छेड़छाड़ के अपने दुष्परिणाम हैं और वह अपने आप में अनैतिक है। किंतु उसके दंडस्वरूप प्रकृति ने कोरोना उत्पन्न किया, महज़ अंधविश्वास है। प्रकृति पर स्व का आरोपण है। प्रकृति चेतन नहीं है कि हमारी तरह बदला ले। कई दैवी आपदाओं की तरह कोरोना की उत्पत्त्ति भी आकस्मिक है। हम आकस्मिकताओं की एक शृंखला के फलस्वरूप अस्तित्व में आए हैं, आकस्मिकताओं के चलते ही हम क़ायम हैं और उन्हीं के चलते समाप्त भी हो जाएँगे।

सच को सच न मानने से वह बदल नहीं जाता।
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―कमलाकांत त्रिपाठी
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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