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सीता-निर्वासन: अवध के लोकगीतों में-२

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सीता-निर्वासन: अवध के लोकगीतों में-२”

―कमलाकांत त्रिपाठी

प्रथम अंक पढ़ें- http://3.226.252.201/sita-expulsion-in-the-folklore-of-awadh/

क्या सीता वन से वापस लौटीं ?

इस प्रसंग पर कम से कम दो अलग-अलग सोहर-गीत हैं। एक में लक्ष्मण को ही उन्हें मनाकर लाने के लिए भेजा जाता है, जो पूर्व-उद्धृत सोहर का अंतिम अंश है। दूसरे में गुरु वशिष्ठ को यह ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है और उनके असफल होने पर राम स्वयं सीता को मनाने जाते हैं और दाम्पत्य-राग व स्त्री अस्मिता के एक अतिशय कारुणिक द्वंद्व की विडम्बना उपस्थित होती है जिसमें अंतत: सीता का अस्मिता-बोध पूर्व दाम्पत्य की प्रगाढ़ता पर भारी पड़ता है. यह एक स्वतंत्र सोहर में है।

अनाम ग्राम्य स्त्रियों द्वारा रचे इन लोकगीतों में सीता का मनुष्योचित आत्म-सम्मान जिस सान्द्रता के साथ अनायास सतह पर आ जाता है, वह कालिदास के रघुवंश के इसी प्रसंग की याद दिलाता है( फ़ुटनोट में देखिए)-

बल्कि इसमें संवेदना का पुट कालिदास की अपेक्षा अधिक सहज-स्वाभाविक लगता है।

एक—लक्ष्मण का प्रयास
(पूर्व-उद्धृत सोहर का अंतिम अंश) :―

अरे रे हँकरौ न बन के नउअवा बेगिहिं चलि आवहु.
नउवा हमार रोचन लै जाउ अजोधिया पहुँचावउ.

[(वन में बच्चे के जन्म के बाद) “अरे, वन के नाऊ को पुकार लगाओ कि जल्दी आये ,वह आया
नाऊ भाई, हमारा रोचन ( हल्दी-चावल की रोली जो बच्चा होने की सूचना के तौर पर भेजा जाता है)
ले जाकर अयोध्या पहुँचा आओ.”]

पहिले दिहौ राजा दसरथ, दुसरे कौसिल्या रानी.
तिसरे रोचन लछिमन देवरा पै, पियै न जनायसि.
राजा दसरथ दिहिन आपन घोड़वा, कौसिल्या रानी अभरन.
लछिमन देवरा दिहिन पाँचौ जोड़वा, बिहँसि नउवा घर चल्यौ।

[“पहला रोचन राजा दशरथ को देना (ग्राम-कवियित्री के लिए जैसे वे अभी जीवित हैं), दूसरा रानी कौशल्या को, और तीसरा देवर लक्ष्मण को देना, किंतु राम को मत जानने देना। नाई ने वैसा ही किया,राजा दशरथ ने नेग में उसे अपना घोड़ा दिया, कौशल्या ने ज़ेवर दिये और लक्ष्मण ने पाँचो पोशाक (पगड़ी, अँगरखा, दुपट्टा, धोती और जूता). नाई ख़ुश होकर घर लौटने लगा.]

चारिउ खूँट क सगरवा त राम दतुइन करैं.
भइया भहर-भहर करै माथ रोचन कहँ पायउ.
भइया केकरे भये नँदलाल त जिया जुड़वायन.
भौजी त हमरे सितल रानी बसहिं बिन्द्राबन.
उनके भये हैं नंदलाल रोचन सिर धारेन.

[चौकोर तालाब के किनारे राम दातुन कर रहे थे. तभी लक्ष्मण उधर आ निकले।
राम ने लक्ष्मण के माथे पर दमकता हुआ रोचन देखा. पूछा—“भाई, यह रोचन कहाँ से आया ?
जी को जुड़ानेवाला पुत्र किसके हुआ है?”

लक्ष्मण ने कहा—“मेरी भौजी सीता रानी के; वृंदावन में रहती हैं. उन्हीं के पुत्र हुआ है, उसी का रोचन सिर पर धारण किया है.”]

हाथ क दतुइन हथ रहि मुख कै मुख रही.
ढुरै लागी मोतियन आँसु पितम्बर भीजै.
हँकरौ न बन के नउआ बेगि चलि आवहु.
नउआ सीता कै हलिया बतावहु सीतै लइ अउबै.

[ सुनते ही राम के हाथ शिथिल पड़ गये, हाथ की दातुन हाथ में रह गई, मुँह धोना भूल गये. आँखों से आँसुओं के मोती ढरकने लगे, पीताम्बर भीग गया।

किसी तरह बोले—“बन के नाई को पुकारकर वापस बुलाओ, जल्दी आये.”
वह आया तो बोले—“भाई नाऊ, सीता का हाल सुनाओ. मैं सीता को अयोध्या वापस लाऊँगा.]

कुस रे ओढ़न कुस डासन, बनफल भोजन.
साहब लकड़ी क कीन्ह अँजोर, संतति मुख देखिन.
अरे रे लछिमन भइया बिपतिया के नायक.
भैया एक बेर जातेउ मधुबन क भौजइया लइ अउतेउ

[नाई ने कहा—“साहब, सीता और बच्चे का कुश का ही ओढ़ना है, कुश का ही बिछौना, सीता ने लकड़ी जलाकर उजाला किया, तब जाकर संतान का मुख देखा.”

राम ने लक्ष्मण से कहा—“अरे भाई, मेरी विपत्ति के नायक लक्ष्मण, एक बार मधुबन (वृंदावन) जाकर ‌किसी तरह सीता को लिवा लावो.”]

अजुधिया से चलि गयें मधुबन उतरें.
भौजी राम क फिरा है हँकार त तुम का बुलावैं.
जाउ लछन घर अपने त हम नहिं जाबै.
जौ रे जियैं नँदलाल त उनही क बजिहैं.

[लक्ष्मण अयोध्या से चले और मधुबन जाकर उतरे।
सीता से बोले—“भौजी, राम भाई साहब का आदेश हुआ है, आपको बुलाने के लिए।

सीता ने जवाब दिया—“लक्ष्मण तुम घर जाओ,मैं नहीं जाऊँगी.।मेरे लाल जीते रहे तो कहलाएँगे तो उन्हीं के.]

यहाँ ग्राम्य कवियित्री के बारीक अल्पकथन पर ध्यान गये बिना नहीं रहता। सीता के साथ लक्ष्मण की अव्यक्त सहानुभूति और राम की अधिनायकी के प्रति दबा-दबा-सा प्रतिरोध का स्वर।

उधर सीता पितृसत्ता के सम्मुख स्त्री की असहायता (कहलाएँगे तो उन्हीं के ही) की ओर क्षीण-सा संकेत करते हुए भी स्त्री-अस्मिता, स्वाभिमान और आत्मसम्मान के मुद्दे पर अटल हैं।और जीवन से अधिक प्रिय संतान की बात जहाँ भी चले, जीने की शर्त के बिना कुछ भी न कह पाना तो अवध की माताओं की सनातन कमज़ोरी है।

दो‌–गुरु वशिष्ठ का प्रयास :―

माघै कै तिथि नौमी राम जग्गि रोपेन.
बिना रे सीता जग्गि सूनि सितै लइ आवउ.
अरे रे गुरु बसिस्ट मुनि पइयाँ तोर लागी.
गुरु तोहरे मनाये सीता अइहीं मनाय लै आवहु.

[माघ की नवमी को राम ने यज्ञ प्रारम्भ किया,लोगों ने राम से कहा, सीता के बिना यज्ञ सूना है, सीता को ले आइये। राम ने गुरु वशिष्ठ से आग्रह किया—
मैं आपके पैर पड़ता हूँ, आप सीता को मना लाइये, आपके मनाने से ही सीता आयेंगी.]

अगवा के घोड़वा बसिस्ट मुनि पाछे लछमन देवर
हेरै लागें रिखि की झोपड़िया जहाँ सीता तप करें.
अँगनेहिं ठाढ़ी सीतल रानी रहिया निहारत.
रामा आवत हैं गुरू हमार त पाछे लछमन देवर।

[घोड़े पर आगे-आगे वशिष्ठ और उनके पीछे-पीछे लक्ष्मण ने अयोध्या से प्रस्थान किया, वन में पहुँचकर वे ऋषि की वह झोपड़ी ढूँढ़ने लगे जिसमें सीता तपस्या करती थीं। सीता द्वार पर खड़ी रास्ते की ओर निहार रही थीं. तभी उन्होंने देखा, उनके गुरु वशिष्ठ और देवर लक्ष्मण आ रहे हैं.]

पतवा के दोनवा बनाइन गंगाजल पानी.
सीता धोवै लागीं गुरु जी के चरन औ मथवा चढ़ावैं.
येतनी अकिल सीता तोहरे तु बुधि कै आगरि
किन तुम हरा है गियान रामहि बिसराये।

[सीता ने (किसी बरतन के अभाव में) पत्ते का दोना बनाया.,उसमें गंगाजल लेकर गुरु के पैर धोये और माथे चढ़ाया।

(सीता के इस शिष्टाचार से प्रभावित) गुरु बोले—

“सीता, तुम्हारे इतनी अक्ल है, तुम तो बुद्धि की ख़ान हो. तुम्हारा सारा ज्ञान किसने हर लिया जो तुमने राम को भुला दिया ?]

सब कै हाल गुरु जानौ अजान बनि पूछौ.
गुरु अस कै राम मोहि डाहेन कि कैसे चित मिलिहैं.
अगिया में राम मोहिं डारेन लाइ भूजि काढ़ेनि
गुरु गरुहे गरभ से निकारेन त कैसे चित मिलिहैं.

[सीता ने कहा—“गुरु जी, आप तो सबका हाल जानते हैं, फिर अनजान बनकर क्यों ऐसा पूछ रहे हैं ? राम ने मुझे इतना त्रास दिया, अब उनसे चित्त कैसे मिलेगा ! उन्होंने मुझे आग में डाला और जलाकर, भूनकर निकाला
फिर जब मैं गर्भ के भार से दबी थी, उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया, ऐसे में उनसे चित्त कैसे मिलेगा !!]

तुम्हार कहा गुरु करबै परग दुइ चलबै.
गुरु अब न अजोधियै जाब, औ विधि न मिलावैं.

[गुरुजी, मैं आपका वचन नहीं टालूँगी,अयोध्या की ओर दो कदम चलूँगी किंतु, गुरु जी, अब मेरा अयोध्या जाना नहीं होगा। अब तो विधि से यही प्रार्थना है कि राम से मेरा मिलना कभी न हो.]

वशिष्ठ ने व्यावहारिक युक्ति के तौर पर सीता में जिस बुद्धि का आरोपण किया था, उसका तात्विक परिचय देते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का सांकेतिक रास्ता सीता ने निकाल लिया, किंतु मानवीय गरिमा और आत्म-सम्मान से कोई समझौता नहीं। इस बिंदु पर अटल,यह ग्राम्य कवियित्री की व्यवहार-बुद्धि और अटूट आत्मसम्मान के सामंजस्य का अपना पाठ है, अपने जीवनानुभव से अर्जित उसका सहज ज्ञान, जिसके सामने गुरु का शास्त्र-ज्ञान बौना है।

तीन–अंत में स्वयं राम, उनकी असफलता और कारुण्य की पराकाष्ठा :―

हँकरहु नगरा के कँहरा बेगि चलि आवहु हो.
कँहरा चनन क डँड़िया फनावउ सितहि लइ आउब हो.
एक बन गइलें दुसर बन तिसरे बिन्द्राबन.
गुल्ली-डंडा खेलत दुइ बलकवा देखि राम मोहेन।

वशिष्ठ के खाली हाथ लौट आने के बाद अंतिम अस्त्र, स्वयं राजाधिराज राम का वन के लिए प्रस्थान:―

नगर के कहारों को बुलाओ, शीघ्र आवें,
कहार हाज़िर;-चंदन की पालकी सजाकर लाओ, मैं स्वयं सीता को वन से लाने जाऊँगा। एक वन पार किया, दूसरा पार किया और पालकी पहुँच गई वृंदावन।पहले दो बालक दिखे गुल्ली-डंडा खेलते हुए. राम उनपर मुग्ध.]

केकर अह्या तू पुतवा औ नतुया, केकर अह्या भतिजवा हो.
कौनी मयरिया कै कोखिया तू जनम जुड़वाया हो.
बाप क नौवाँ न जानउँ, लखन क भतिजवा हो.
हम राजा जनक के हैं नतिया, सीता कै दुलरुआ हो.

[राम ने पूछा—“बच्चो, तुम किसके बेटे और किसके पोते हो? किसके भतीजे हो ? किस माँ की कोख से जन्म लेकर उसे शीतल किया है ?बच्चों ने कहा—हम अपने बाप का नाम नहीं जानते, इतना जानते हैं कि हम लक्ष्मण के भतीजे हैं, राजा जनक के नाती हैं और सीता माँ के दुलारे बेटे हैं.]

एतना बचन राम सुनलेन सुनहू न पउलेनि हो.
रामा तरर तरर चुवै आँसु पटुकवन पोछइँ हो.

[राम बच्चों की इतनी बातें सुने, पूरी सुन भी न पाये थे कि आँखों से झरझर आँसू गिरने लगे. दुपट्टे से उन्हें पोंछते हुए वे आगे बढ़ गये-

अगवैं रिखि क झोपड़िया राम नियरानेनि हो.
रामा छापक पेड़ कदम कर लगत सुहावन हो.
तेहि तर बैठि सितल रानी केसियन झुरवइँ हो.
पछवाँ उलटि जब चितवैं रामजी ठाढ़े हो.

[आगे ही ऋषि की कुटी थी,राम उसके पास पहुँच गये. कुटी के पास एक छोटा-सा कदम्ब का पेड़ था।उसी के नीचे (दूसरी ओर मुँह करके) बैठी सीता बाल सुखा रही थीं,उन्होंने पीछे मुड़कर देखा. सामने राम खड़े थे.]

रानी छोड़ि देहु जियरा बिरोग अजोधिया बसावहु हो.
सीता तोरे बिन जग अँधियार त जिवन अकारथ हो.
सीता अँखिया में भरली बिरोग एकटक देखिन हो.
सीता धरती में गईं समाइ कुछौ नाहीं बोलिन हो.

[राम—“सीता रानी, हृदय का बिरोग छोड़ दो (गिला-शिकवा भूल जाओ)-
चलकर अयोध्या बसाओ,तुम्हारे बिना संसार मुझे अँधेरा लगता है, और जीवन निरर्थक.” सीता की आँखों में अतीत की सारी व्यथा उमड़ आई. वे राम को एकटक देखती रहीं, चुपचाप और फिर -बिना कुछ बोले धरती में समा गईं.]

ग्राम्य कवियित्री का एक भी शब्द बदलने से डर लगता है कि अर्थ कहीं खो न जाए,यह गीत उनके जीवन से निकला है।गाने के लिए और रोने के लिए।उनकी पुंजीभूत पीड़ा का catharsis. अंतत: ग्राम्य कवियित्री की सीता वाल्मीकि की सीता से बहुत आगे जाकर ग्राम्य स्त्रियों के अस्मिता-बोध और उनकी पूंजीभूत वेदना से एकाकार हो जाती हैं।

००००००००
कालिदास के रघुवंश में:―

लक्ष्मण गर्भवती सीता को निर्जन वन में छोड़कर जाने लगे तो सीता ने लक्ष्मण के माध्यम से राम को जो संदेश दिया, वह उन्हें वाल्मीकि की सीता से सर्वथा पृथक्‌, अपनी अस्मिता के प्रति पूर्ण सजग और राम के प्रति बेहद कटु बनाता है:-

वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स राजा वह्नौ विशुद्धामपि यत्समक्षम्‌।
मां लोकवादश्रवणादहासी: श्रुतस्य किं तत्सदृशं कुलस्य ॥14:61॥

[मेरी ओर से तुम उन ‘राजा’ से कहना कि आपने अपने सामने अग्नि में शुद्ध पाकर भी लोगों में अपयश के डर से जो मेरा परित्याग किया है, क्या वह उस प्रसिद्ध कुल के योग्य है, जिसमें आपने जन्म लिया था?]

कालिदास ने सीता के मुंह से राम के लिए यहां ‘राजा’ शब्द का प्रयोग कराकर बहुत कुछ व्यंजित कर दिया है। यह शायद पहली और आख़िरी बार है जब रघुवंश में सीता द्वारा राम के लिए राजा शब्द का प्रयोग हुआ है।

इस प्रकरण में राम अपनी पत्नी की निगाह में मनुष्यता से फिसलकर राजा मात्र रह गए हैं, वह भी ऐसे राजा जिसने अपने दोहरे व्यवहार से अपने कुल की मर्यादा को स्खलित किया है। इस तरह कालिदास की सीता ने निराधार लांक्षित होने पर राम को ही लांक्षित कर दिया।

कमलाकांत त्रिपाठी
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

http://3.226.252.201/लेखक-परिचय-श्री-कमलाकांत/

[साहित्य में राम का पक्ष: परंपरा में कालिदास और भवभूति का नवोन्मेष -अगले अंक में]

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