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उपन्यास :-निशांत का कोहरा घना-१

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प्रिय!पाठको

कथा संसार में वरिष्ठ साहित्यकार श्री कमलाकांत त्रिपाठी  के उपन्यास “निशांत का कोहरा घना” का एक भाग नियमित तौर पर आप सभी के बीच प्रतिदिन जारी रहेगा। उनके इस उपन्यास  में आपको इतिहास ,गाँव,स्वतंत्रता,क्रांति  एवं माटी की सोंधी खुशबू के साथ ही आप सभी आत्मिक जुड़ाव एवं परिवर्तन महसूस करेंगे।

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निशांत का कोहरा घना-१

श्री कमलाकांत त्रिपाठी (वरिष्ठ साहित्यकार)

―कमलाकांत त्रिपाठी 

कच्ची सड़क पर दूर एक धब्बा दिखता है। तेज़ी से बढ़ता हुआ और इधर सरकता हुआ। फिर एक बैलगाड़ी का आकार नज़र आने लगता है। बदहवास गाड़ीवान हड़बड़ी में उँचे, पुष्ट बैलों को ज़ोर से हाँकता है तो वे दौड़ने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे उनकी चाल धीमी पड़ जाती है। गाड़ीवान बैलों की पूँछ हल्के से उमेठकर ऊँचे स्वर में फिर से हाँकता है। वे फिर दौड़ने लगते हैं।

आसमान में काली घटा छाई है। बीच-बीच में बदल गरज रहे हैं। दूर, क्षितिज के पास, बादलों से धरती तक एक टेढ़ी-मेढ़ी चमकदार रेखा लपलपाकर बुझ जाती है। फिर उधर से बहुत ज़ोर की कड़कड़ाहट उठती है। सड़क के दोनों ओर, धान के खेतों में निराई करते लोग चौंककर इधर-उधर देखते हैं कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी। फिर काम में लग जाते हैं। बारिश के आसार हैं, उसके शुरू होने के पहले जितना खेत निपट जाए, अच्छा है। ज़ोर का एक लहरा पड़ गया तो निराई हफ़्ते भर के लिए गई।

बैलगाड़ी खेतों के पास पहुँचती है तो निराई करते लोग सर घुमाकर गाड़ीवान पर सवालिया निगाह डालते हैं।

“गारद आई है, गारद…बलवा…”

“कहाँ भैया?”

“तहसील….तहसील के सामने।“

अरे!….मति मारी गई थी सपूत की।“ मातादीन अनायास बुदबुदा उठा। भीतर ऐसी उमड़-घुमड़ कि निराई करते हाथ काँपने लगे। ऐसे तो एक हाथ खुरपी से कट सकता है। मन नहीं चाहता कि और लोग भीतर का हाल जानें किंतु हाथ उसका कहा मानने में असमर्थ।

कल शाम…आसमान में बिखरे-बिखरे बादल थे। उदास और फीके। धीरे-धीरे रेंगते हुए। बाग़ के पश्चिम बादलों का एक बड़ा पहाड़ देर से एक ही जगह जमा हुआ था। उसके पीछे दबा सूरज गुस्से से तमतमा रहा था। उसने बादल को खरोंचकर लहूलुहान कर दिया था। उसे भेदकर निकलती किरणें पेड़ों की फुनगियों पर आग की लपट-जैसी फैली थीं। बाग़ में धूप नहीं थी लेकिन उमस बेसम्भार थी।

मातादीन बाग़ की घनी-लंबी घास काटते-काटते पसीने से तर हो गया था। घास के तिनके पसीने से चिपककर देह में गड़ रहे थे। वह साथ लाई रस्सी से घास का बोझ बाँध रहा था, कि क़स्बे के बाज़ार से लौटते गाँव के दो लोग उधर से जानेवाले रास्ते से गुज़रते दिखे। एक अधेड़ था, एक नौजवान। एक पेड़ के नीचे खड़े होकर दोनों गमछे से गर्दन और मुँह का पसीना पोंछने लगे। पेड़ की छाया के कारण वहाँ घास नहीं उगी थी और साफ़ चटियल ज़मीन दिख रही थी। मातादीन ने सोचा, उनमें से कोई बोझ उठा देगा। वह बोझ उठाने के लिए कहने ही वाला था कि दोनों पेड़ के नीचे, पास-पास उभरी दो जड़ों पर बैठ गए और बातें करने लगे।

“का हो महतो, कल तहसील का खजाना सच में लूटा जाएगा।“

“बाजार में सुनगुन तो यही थी, भैया….कोई कह रहा था, गांधी बाबा का हुकुम है।“

मातादीन आगे बढ़कर बात में शामिल हो गया– “मैंने तो सुना है, गांधी बाबा ने गोरों को देश छोड़ने को कहा है और हमें अपने को आजाद मानकर चलने और आजादी के लिए जान जाने तक लड़ने को कहा है…ई खजाना लूटने की बात कहाँ से आ गई महतो? खजाना लूटने से आजादी मिल जाएगी?“

हमें क्या मालूम भगत, गांधी बाबा ने क्या कहा, क्या नहीं कहा। हम उनको सुनने थोड़े गए थे। लेकिन लोगों में मिसकौट हुई है कि खजाना लूटना है तो लूटेंगे।“

“हुँह…मिसकौट….चार लुंगाड़े मिल गए और मिसकौट हो गई. और बाकी लोग भी मान गए…बिनास काले बिपरीत बुद्धी…खैर, जो करेगा सो भरेगा।“ मातादीन नौजवान की ओर मुख़ातिब हुआ, “भइया जरा घसिया उठा दो, मैं चलूँ। जानवरों का सानी-पानी करना है, बिलम हो रहा है।“

घास का बोझ उठाए मातादीन सार के पास पहुँचा तो गाय रँभाकर पगहा खींचने लगी। दोनों बैल भी उसकी ओर रुख़कर सर हिलाते हुए झौंकारने लगे।

“मिल रहा है, मिल रहा है, सबर करो।“ बुदबुदाता हुआ वह आगे बढ़ गया।

बेटा ओसारे में गड़े नसुहे पर ज्वार की चरी बाल रहा था। उसकी खच्च-खच्च आवाज़ दूर तक गूँज रही थी। द्वार पर बोझ गिराकर पसीना पोंछते हुए वह पानी पीने घर के अंदर जाने लगा तो नहुसे के पास रुक गया।

“अभी तक तुम्हारा खुट खुट ही चल रहा है! जानवर छटपटा रहे हैं। वो भी जीव हैं, उनको भी भूख लगती है…कहाँ बिचर रहे थे?”

जमुना ने हाथ रोककर उसकी ओर देखा और बिना कुछ कहे फिर चरी बालने में लग गया।

“कल धान की निराई शुरू करनी है….आज की तरह कहीं खिसक मत लेना…थोड़ा फोंफर मिला है, पता नहीं कब बारिश फिर शुरू हो जाए।“

एक ढोंका गुड़ खाकर पानी पीने के बाद वह दोनों हाथों में गगरियाँ लेकर बाहर निकला। सामने के गड्ढे से पानी लाकर जानवरों के हौदे धोए और भीगी हुई अवशिष्ट कुट्टी से गँदला हुआ पानी उलीचकर हौदों को सुखा दिया। फिर तीनों हौदों में चार-चार गगरी पानी डालने के बाद झौवा उठाया और भुसौल से भूसा लाकर चरी की कुट्टी से मिलाने लगा। जमुना की खुट-खुट अभी भी चल रही थी।

हौदों में एक-एक झौवा कुट्टी-मिला भूसा डालकर ऊपर से हँडिया में रखा चोकर और खली का घोल छिड़क दिया और जानवरों को हौदों पर बाँध दिया। गड्ढे पर जाकर हाथ-पैर धोए और द्वार पर आकर, बेटे को कुछ देर बाद हौदों में एक-एक झौवा कुट्टी और डालने की ताकीद कर, एक खड़ी चारपाई गिराया और लेट गया। देह थककर चूर हो गई थी। जोड़-जोड़ दर्द कर रहे थे। लेकिन ख़ज़ाना लूटनेवाली बात थी कि दिमाग़ में खलबली मचाए थी।

मातादीन को कोई अंदाज़ नहीं था, तहसील के सरकारी ख़ज़ाने में कितना रुपया होता होगा। पर उसने क़स्बे में तहसील के विस्तृत अहाते के बीचोबीच ख़ज़ाने की इमारत ज़रूर देखी थी। बहुत मोटी दीवार वाली एक गोल कोठरी थी। उसमें मोटे लोहे का दरवाज़ा लगा था। उससे सटा हुआ मोटे-मोटे सींखचों का दूसरा दरवाज़ा था। दोनों दरवाज़ों में हमेशा बड़े-बड़े ताले पड़े रहते। इस दरवाज़े के अलावा उस कोठरी में कोई खिड़की या रोशनदान नहीं था। उसने जब भी देखा, दरवाज़े के सामने एक संतरी को संगीन लगी बंदूक कंधे से लगाए सावधान मुद्रा में खड़े देखा…लोगों की भीड़ उस ख़ज़ाने को कैसे लूटेगी? और लूट भी लिया तो जो मिलेगा उसे आपस में बाँटेगी कैसे? उसने कल्पना के घोड़े दौड़ाने की बहुत कोशिश की किंतु दिमाग़ को असमर्थ पाया।

खाना खाने के बाद लेटने के पहले उसने जानवरों को सार से निकालकर बाहर खुली हवा में बाँधा और खाट पर कथरी बिछाकर लेट गया। आकाश में बादल छा गए थे, सिर्फ़ एक कोने में वह खुला हुआ था और वहाँ कुछ तारे टिमटिमा रहे थे।

रात में बारिश नहीं हुई। सुबह आँख खुली तो आसमान साफ़ था। वह दिशा-मैदान के लिए निकल गया। दातुन-कुल्ले के लिए तालाब पर पहुँचा तो वहाँ गाँव के कई लोग जल्दी-जल्दी दातुन कर करे थे और आपस में बातें भी करते जा रहे थे। वह समझता था, तहसील का ख़ज़ाना लूटनेवाली बात बाग़ में मिले उन दोनों के अलावा सिर्फ़ उसी को मालूम थी। उसे जानकर निराशा हुई कि वह बात तो आम हो गई है और कई लोग आज क़स्बा जानेवाले हैं…और जमुना? उस पर निगाह रखनी होगी। लेकिन वहाँ से घर लौटा तो पता चला, जमुना नहा-धोकर, कलेवा खाकर कहीं के लिए निकल चुका है। उसने घर में दरियाफ़्त किया तो मालूम हुआ, जमुना ने न माँ को बताया, न बहू को कि कहाँ जा रहा है।

मातादीन ने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर उठाए और आशा-निराशा के बीच झूलता, धान का खेत निराने के लिए तैयार होने लगा।
―कमलाकांत त्रिपाठी

http://3.226.252.201/लेखक-परिचय-श्री-कमलाकांत/

(क्रमश:) अगले  अंक में।

आपको उपन्यास का यह भाग कैसा लगा?  आप अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में अवश्य दें!!

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