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उदयपुर की मर्मान्तक कथा : राजमहल में मदरसा ― विजय मनोहर तिवारी

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उदयपुर की मर्मान्तक कथा : राजमहल में मदरसा

― विजय मनोहर तिवारी
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क्या आपमें से किसी के भी घर या फ्लैट के सामने ऐसा साइनबोर्ड कहीं टंगा है कि यह निजी संपत्ति है और साथ में तीन पीढ़ियों के नाम भी? इसकी कोई जरूरत नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा घर ढूंढने में दिक्कत न हो तो लोग एक नेम प्लेट लगा लेते हैं। अगर वह मकान आपका है तो यह अलग से कौन लिखता है कि यह निजी संपत्ति है? हां अगर ऐसा न हो और केवल कब्जा हो ताे जरूर यह ऐलान करना जरूरी है। उदयपुर के प्राचीन राजमहल के खंडहरों पर यही पाया गया।

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विदिशा जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर प्राचीन उदयपुर नगर के राजमहल की एक असलियत सामने आ गई है। पिछले रविवार को प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र के साथ हेरिटेज वॉक के दौरान परमार स्थापत्य के बेमिसाल स्मारक एक पुराने राजमहल पर किसी की निजी संपत्ति के ऐलान का साइनबोर्ड देखा गया था। फेसबुक पेज पर उस पोस्ट पर विदिशा के पत्रिका संवाददाता गोविंद सक्सेना की नजर पड़ी। उन्होंने डॉ. मिश्र से बातचीत की और एक बड़ी खबर स्थानीय संस्करण में लिखी। प्राचीन विरासत का मामला होने से कुछ संगठन जागे और प्रशासन की रजाई खींचकर एक ज्ञापन सौंप आए। तहसीलदार भी धूल झाड़कर उठे और प्राचीन महल की दीवार को पहली बार जाकर देखा।

दरअसल उदयपुर की सचित्र सच्चाई प्रधानमंत्री, केंद्रीय पर्यटन मंत्री और मुख्यमंत्री को भी ट्वीट की गई थीं। पत्रिका अखबार ने मुहिम के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझी और फौरन असर यह हुआ कि एक तहसीलदार को राजमहल के खंडहरों पर जाना पड़ गया। सवालों के साथ कुछ कैमरापर्संस भी वहां गए। अब आगे का दृश्य मजेदार है।

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एक कैमरापर्सन ने सवाल पूछा तो एक साहब सीधे बादशाह जहांगीर के दरबार में जा पहुंचे और बताया कि जहांगीर ने इस महल की संगे-बुनियाद उदयपुर में रखी थी। शाहजहां के समय यह बनकर तैयार हुआ और काजी साहब के खानदान को दे दिया गया ताकि वे मस्जिद में नमाज पढ़ाते रहें। काजी साहब कहीं शहर में बस गए और महल में मदरसा खोल दिया।

अगर जहांगीर या शाहजहां ने इन्हें यह जगह दी है और यह इनकी निजी संपत्ति मान ली जाती है तो सरकार को वे 84 गांव भी इन्हें देने होंगे, जिनकी जमींदारी इनके अनुसार इन्हें मुगलों ने दी थी। किले पर अपनी निजी संपत्ति का ऐलान करने वाले साइनबोर्ड की सफाई में इनके पास जहांगीर-शाहजहां का यही किस्सा है। शायद उनके संज्ञान में यह नहीं है कि 15 अगस्त 1947 के बाद ही निजाम नहीं बदला है। 1857 में अंग्रेज ही आखिरी मुगल को रंगून रवाना कर चुके थे। अब लालकिले पर मुगलों का कोई दावा नहीं है। न कोई मुगल हैं। वो इरफान हबीबों के ख्यालों में रोशन हैं।

और अब तहसीलदार दृश्य में आते हैं:―

वे कह रहे हैं कि कल किसी ने गेट पर निजी संपत्ति का बोर्ड लगा दिया था, उसे हटा दिया गया है। यह साढ़े तीन बीघा में फैला राजमहल पुरातत्व विभाग में आता है। राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार यह निजी संपत्ति नहीं है। तहसीलदार शायद जीवनकाल में पहली बार इस गली में फटके। वह बोर्ड कल नहीं लटका था। कई सालों से था। चार दिन पहले इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र दिल्ली से आकर उदयपुर के मुआयने में वह देखकर लौटे थे। तहसीलदार को अपने क्षेत्रीय पटवारी से पूछना चाहिए कि ऐेसे कितने पुराने खंडहरों पर कौन कब्जा किए हुए है, जिसके बारे में अभी जानकारियां आना बाकी हैं?

फिलहाल राजमहल के खंडहरों में मदरसा संचालित है, जहां मुस्लिम बच्चों को मजहबी तालीम दी जाती होगी। मुमकिन है उन्हें उदयपुर के इतिहास के बारे में भी कुछ ज्ञान दिया जाता होगा। पता नहीं मौलवी को खुद उदयपुर का कितना असल इतिहास पता होगा और कितना वे जहांगीर से शुरू होकर काजी पर खत्म कर देते होंगे। क्या बच्चे कभी पूछते होंगे कि उदयपुर की सबसे शानदार पहचान यह हजार साल पुराना बुतखाना किसने बनाया था? जब वह बुतखाना बन रहा था तब हमारे पुरखे यहां कहां थे, क्योंकि तब तो इस्लाम की डाक यहां के किसी पते पर आई नहीं थी? तब हमारे पुरखे उदयपुर में किस असल नाम से क्या करते थे?

फिर जहांगीर (सलीम बल्द अकबर, जो नशेड़ी शहजादों में से एक था) कब, कहां से और क्यों चले आए? मंदिर की दीवारों पर तोड़ी गई मूर्तियों में किसका हाथ है और एक सबसे अहम सवाल यह कि यह मंदिर बच कैसे गया? इसका भी वही हाल क्यों नहीं हो पाया जो विदिशा में विजय मंदिर का किया गया? क्या हमलावरों का प्रतिकार करने वाले स्थानीय नागरिक भारी पड़ गए थे जो मामूली तोड़फोड़ के बाद ही यह मंदिर बचा लिया गया? मदरसे में पता नहीं बच्चे ऐसे सवाल करते होंगे या नहीं या जो मौलवी ने बता दिया वही इतिहास है कि जहांगीर ने संगे बुनियाद रखी थी।

परमार वंश के राजा उदयादित्य के मंदिर में तीनों द्वारों के पत्थरों पर बीस से ज्यादा शिलालेख हैं, जो उस समय की महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। यह तब की बात है जब जहांगीर तो छोड़िए बाबर के बापदादों के फरगाना में भी अते-पते नहीं होंगे। यह ग्यारहवीं सदी की बात है। पत्रिका अखबार में प्रमुखता से मसला सामने आने के बाद विदिशा शहर के प्रबुद्ध लोगों ने कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन दिया है। किसी ज्ञापन की प्रतीक्षा के बगैर कलेक्टर को खुद जाकर देखना चाहिए और कानूनी कार्रवाई कागजों पर नहीं करनी चाहिए। उदयपुर के चप्पे-चप्पे के प्राचीन स्मारकों के संरक्षण की कार्ययोजना बनानी चाहिए और अगले तबादले के पहले उसे अमल में लाना चाहिए।

धन-संपदा, पद-प्रताप और संतान की कामनाओं के साथ उदयपुर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए सिर्फ नीलकंठेश्वर शंकर भगवान नहीं बैठे हैं। कुछ कर्त्तव्य भी हैं नागरिकों के जो नहीं किए गए हैं। जो संगठन अब जागकर खड़े हो गए हैं, वे जरा अपने जनप्रतिनिधियों को भी हिलाएं और उनकी एक शोभायात्रा उदयपुर ले जाएं। स्कूल-कॉलेज के दल वहां पहुंचे। शिक्षण संस्थाएं भी कुछ रचनात्मक अभियान चलाएं। यह काम किसी एक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता कि अखबार ने छाप दिया और अपन कलेक्टर को ज्ञापन देकर रजाई में लौटकर दुबक गए। फोटू छप गई।

इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र ने उस दिन उदयपुर से लौटते हुए कहा था कि पूरा उदयपुर नगर ही हेरिटेज टाउन की तरह विकसित किया जा सकता है। हमारे पुरखे विजय मंदिर नहीं बचा पाए, हम उदयपुर ही बचा लें। तो अब गैर कानूनी गुमटियां हटाने का समय है।
― विजय मनोहर तिवारी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, भारतीय धर्म-संस्कृति, इतिहास के मर्मज्ञ हैं)

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