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इंदौर में भाजपा महापौर पद के लिए कांग्रेस को क्या वॉकओवर दे रही है?

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इंदौर । मध्यप्रदेश की हाई प्रोफाइल महापौर सीट के नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते है। दीगर बात है कि चुनाव प्रचार के बचे कुछ में दिनों छोटी अयोध्या कहे जाने वाले इस महानगर में चुनावी ऋतु एकदम बदल जाए, लेकिन फिलहाल तो संजय शुक्ला ने 18 लाख ३६ हजार वोटरों का आधा शहर नाप लिया है, जबकि भाजपा प्रत्याशी जो राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं, पुष्यमित्र भार्गव है के चुनाव प्रचार में ज्यादा गर्माहट भी नहीं आई है।

यह उस शहर की कहानी है, जहां से लगातार आठ बार भाजपा प्रत्याशी सुमित्रा महाजन लोकसभा के लिए चुनी गई, और अंतिम बार वे सफल स्पीकर भी रही। वर्तमान में भी भाजपा के स्थानीय सांसद शंकर लालवानी पीएम नरेंद्र मोदी की सुनामी में रिकार्ड पांच लाख वोटों से जीते थे। इतना ही नहीं भाजपा के लगातार दूसरी बार राष्ट्रीय महासचिव बने पूर्व प्रदेश केबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तक इन्दौर मूल के हैं।

भाजपा के भीतर खानों की खबरों पर विश्वास करें, तो विजयवर्गीय ने खुले आम भाजपा प्रत्याशी पुष्य मित्र भार्गव के नाम का समर्थन किया, मगर अब वे जैसे अज्ञात वास पर चले गए हैं। इसी तरह न तो विधायक रमेश मेंदोला, महेंद्र हार्डिया, सिटिंग महापौर एवं विधायक मालिनी गौड़, पूर्व नगर अध्यक्ष और विधायक गोपी नीमा, वरिष्ठ नेतागण मधु वर्मा, आकाश विजयवर्गीय भाजपा उम्मीदवार पुष्य मित्र भार्गव के समर्थन में अभी तक सक्रिय नहीं हुए हैं। पूर्व स्पीकर सुमित्रा महाजन, तो वैसे ही अस्वस्थ रहती हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि भार्गव के साथ कुछ अनहोनी होती है, तो पूरी भाजपा इसके लिए जिम्मेदार होगी।

चाय की गुमटी पर अपने हाथ से चाय बनाकर पीना, बच्चों को गोद में लेना, मंदिरों के जूते उतारकर दर्शन करना, फूलों से एलर्जी होने के बावजूद स्वागत करवा लेना संजय शुक्ला के चुनावी टोटके आम जनता की नजरों में आ रहे है, जबकि भार्गव के समर्थन में उनके पुराने स्कूल कालेज के छात्रों के साथ प्रबंधकों ने रैली निकाली। यह बड़ा रोचक तथ्य है। कांग्रेस का नजारा यह है कि विधानसभा क्रमांक तीन की कमान पूर्व विधायक अश्विन जोशी ने सम्हाल रखी है।

जोशी एक, तो पूर्व मंत्री महेश जोशी के भतीजे हैं, दूसरा कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं, और पढ़े लिखे होने के साथ ही आक्रमक राजनीति के लिए जाने जाते हैं। उधर, भाजपा के प्रत्याशी पुष्यमित्र भार्गव अति सौम्य हैं। उनके साथ प्रचारक भी गिनती के हैं। फैसला इस अंतिम प्वाइंट पर भी हो सकता है कि संजय शुक्ला को सियासत घुट्टी में मिली हुई है। उनके पिता विष्णू प्रसाद शुक्ला इन्दौर में भाजपा के आधार पुरुष माने जाते रहे हैं। अलग बात है कि संजय शुक्ला ने राजनीतिक सफर कांग्रेस के पार्षद के रूप में शुरू किया था। वे खुद विधानसभा क्रमांक दो के दो बार विधायक रह चुके हैं।

वहां वे इसलिए काफी लोकप्रिय बताए जाते हैं, कि आधी रात को भी किसी का भी काम करवाने को तैयार रहते हैं। उनका यही जन सेवक का जज्बा कोविड के दौरान रोगियों के लिए भाग दौड़ करते हुए देखने को मिल। रेमिडिसिवर इंजेक्शन की जब किल्लत हो गई थी, तब उन्होंने खाली चैक प्रशासन को सौप दिया था।पुष्य मित्र के साथ एक दिक्कत यह भी है कि उन्हें प्रचार के लिए 17दिन ही मिले। अब उनके पास इतना समय ही नहीं है कि जीप से उतरकर मतदाताओं से मिल सकें। उन्हें इतना अकेला कर दिया गया है कि वे जिस विधान सभा क्षेत्र में जाते हैं वहां के विधायक उनके साथ थोड़ी देर के लिए हो जाते हैं ओर फिर बस। खास बात यह भी है कि भार्गव के चुनाव प्रचार की कमान मधु वर्मा, प्रमोद टंडन और रमेश मेंदोला के हाथ में है, जबकि संजय शुक्ला ने खुद सभी सूत्र अपने हाथ में ले रखे हैं। इन्दौर में लगभग छह लाख ब्राह्मण वोट हैं। इनमें से कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का संजय शुक्ला के साथ जाना लगभग तय है।

पुष्य मित्र भार्गव को अधिकांश गोत्र के ब्रह्मण वोट मिल सकते हैं। एक गणित यह भी है कि इस महानगर में 18 से 19 साल के युवा वोटर्स की संख्या कुल 3 लाख 70 हजार है, जो कुल वोटर्स के 21 फीसद है। ये वोटर कांग्रेस से मूल रूप से नाराज़ हैं। इसलिए इनमें से अधिकांश भाजपा के पाले में आने की संभावना ज़्यादा है। उधर, 30 से 39 साल की उम्र के वोटर 5 लाख 27 हजार हैं। माना जा रहा कि साहूकार, सिंधी, मराठा और महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण समाज के वोट थोक में भाजपा को मिल भी सकते हैं। कांग्रेस की मुख्य चुनौती यही बताई जाती है कि इन वोटर्स को अपनी तरफ कैसे खिंचे।

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